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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

गीतावली ६६ बसी मानहु चरन-कमलनि अरुनता तजि तरनि। रुचिर नूपुर किंकिनी मन हरति रुनझुनु करनि॥ २॥ मंजु मेचक मृदुल तनु अनुहरति भूषन भरनि। जनु सुभग सिंगारसिसु तरु फरचौ है अद्भुत फरनि॥ ३॥ भुजनि भुजग, सरोज नयननि, बदन बिधु जित्यो लरनि॥ रहे कुहरनि, सलिस, नभ, उपमा अपर दुरि डरनि॥ ४॥ लसत कर-प्रतिबिम्ब मनि-आँगन घुटुरुवनि चरनि। जनु जलज-संपुट सुछबि भरि भरि धरति उर धरनि॥ ५॥ पुन्यफल अनुभवति सुतहि बिलोकि दसरथ-घरनि। बसति तुलसी-हृदय प्रभु-किलकनि ललित लरखरनि॥ ६॥ रघुनाथजीकी बालछविका न वर्ण करके कहता हूँ, वह सकल सुखकी सीमा और करोड़ों कामदेवोंकी शोभाका हरण करनेवाली है॥ १॥ अरुणता मानो सूर्यको त्यागकर उनके चरणकमलोंमें ही आ बसी है। मनोहर नूपुर और किङ्किणीका रुनझुन शब्द मनको हरे लेता है॥ २॥ अति मनोहर और मृदुल श्याम शरीरपर आभूषणों- की सजावट ऐसी जान पड़ती है मानो अति सुन्दर शृङ्गाररसका नन्हा-सा पौधा अद्भुत फलोंसे सम्पन्न हुआ हो॥ ३॥ [सौन्दर्यकी] लड़ाईमें प्रभुकी भुजाओंने सर्पोंको, नेत्रोंने कमलोंको तथा मुखने चन्द्रमाको जीत लिया है। इसीसे वे क्रमशः बिल, जल तथा आकाश- में जा बसे हैं। [यह देखकर] अन्य उपमाएँ (उपमान) भी डरकर दूर भाग गयी हैं॥ ४॥ मणिमय आँगनमें घुटनोंके बल चलते समय जो हाथोंका प्रतिबिम्ब पड़ता है वह ऐसा जान पड़ता है मानो धरणी छबिको कमलके सम्पुटमें भर-भरकर अपने हृदयमें धारण कर रही

६७ बालकाण्ड हो ॥ ५ ॥ उस समय महाराज दशरथकी गृह-लक्ष्मी कौसल्याजी अपने लालको देखकर अपने पुण्यफलका अनुभव कर रही थीं। तुलसीदासके हृदयमें भी प्रभुका वह किलकना और आनन्ददायक लड़खड़ाना बसा रहता है ॥ ३ ॥ [ २८ ] नेकु बिलोकि धौं रघुबरनि । चारु फल त्रिपुरारि तोको दिये कर नृप-घरनि ॥ १ ॥ बाल भूषन बसन, तन सुन्दर रुचिर रजभरनि । परसपर खेलनि अजिर, उठि चलनि, गिरि गिरि परनि ॥ २ ॥ झुकनि, झाँकनि, छाँह सों किलकनि, नटनि, हठि लरनि । तोतरी बोलनि, बिलोकनि, मोहनी मनहरनि ॥ ३ ॥ सखि-बचन सुनि कौसिला लखि सुढर पासे ढरनि । लेति भरि भरि अंक सँतति पैंत जनु दुहु करनि ॥ ४ ॥ चरित निरखत बिबुध तुलसी ओट दै जलधरनि । चहत सुर सुरपति भयो सुरपति भये चहै तरनि ॥ ५ ॥ [ किसी समय माता कोसल्याको अन्यमनस्का देखकर कोई सखी कहती है—] अरी राजरानी ! तू तनिक इन रघुवीरोंकी ओर देख तो सही। श्रीशङ्करने तेरे हाथमें चारों फल प्रदान किये हैं ॥ १॥ तू इनके बालोचित वस्त्र और आभूषण, सुन्दर शरीरकी दर्शनीय धूलि-धूसरता, आँगनमें आपसका खेल-कूद, उठ-उठकर चलना और फिर गिर-गिर पड़ना, झुकना, झाँकना, परछाई देखकर किलकना, नाचना, हठ करके लड़ना, तोतली बोली बोलना तथा मनको हरने- वाली मोहिनी चितवन तो देख ॥ २-३ ॥ सखीके ये वचन सुनकर कौसल्याजीने समझ लिया कि मेरे अच्छे पाँसे पड़े हैं ( मैं भाग्यवती

गीतावली ६८ हूँ)। इसलिये वे रामका बारम्बार आलिङ्गन करने लगीं, मानों दाँव जीतनेवाला अपने जीतके द्रव्यको दोनों हाथोंसे बड़ी लालसाके साथ समेटता हो ॥४॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस चरित्रको देवता लोग बादलोंकी ओटमें खड़े होकर देख रहे हैं और [इसे निरन्तर देखते रहनेकी इच्छासे] देवता तो इन्द्र (सहस्राक्ष) होना चाहते हैं और इन्द्र सूर्य (सहस्रकर) होनेके लिये उत्सुक हैं ॥ ५ ॥ राग जैतश्री [ २९ ] भूमितल भूपके बड़े भाग। राम लखन रिपुदमन भरत सिसु निरखत अति अनुराग ॥ १ ॥ बालविभूषन लसत पायँ मृदु मंजुल अंग-बिभाग । दसरथ-सुकृत मनोहर बिरवनि रूप-करह जनु लाग ॥ २ ॥ राजमराल बिराजत बिहरत जे हर-हृदय-तड़ाग । ते नृप-अजिर जानु कर धावत धरन चटक चल काग ॥ ३ ॥ सिद्ध सिहात, सराहत मुनिगन, कहैं सुर किंनर नाग । 'ह्वै बरु बिहँग बिलोकिय बालक बसि पुर उपबन बाग' ॥ ४ ॥ परिजन सहित राय रानिन्ह कियो मज्जन प्रेम-प्रयाग । तुलसी फल ताके चारचो मनि मरकत पंकजराग ॥ ५ ॥ इस पृथ्वीतलमें राजा दशरथके बड़े भाग्य हैं, क्योंकि वे बालक राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नको अनुरागपूर्ण दृष्टिसे निहारते हैं॥१॥ बालकोंके चरणोंमें तथा अतिमृदुल और सुन्दर अङ्ग-प्रत्यङ्गमें जो यथास्थान विभाजित करके बालोचित आभूषण सजाये गये हैं वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो महाराज दशरथके मनोहर पुण्यरूपो पौधोंमें रूपका कल्ला

निकल आया हो॥ २॥ जो [भगवान् रामरूप] राजहंस श्रीशङ्करके हृदयसरोवरमें विहार करता है वही इस समय चञ्चल कौएको पकड़ने- के लिए महाराज दशरथके आँगनमें तेजीसे घुटनों और हाथोंके बल दौड़ रहा है॥३॥ यह देखकर सिद्धलोग मन-ही-मन सिहाते (प्रसन्न होते ) हैं और मुनिजन महाराज दशरथके भाग्यकी बड़ाई करते हैं और देवता, किन्नर तथा नाग यह कहते हैं—'अच्छा होगा कि हम पक्षी होकर महाराजके पुर, उपवन एवं बगीचोंमें रहते हुए इन बालकोंको निहारा करते'॥४॥ महाराज दशरथ और रानियोंने अपने कुटुम्बियोंके सहित प्रेमरूप प्रयागमें स्नान किया है। तुलसीदासजी कहते हैं कि ये मरकत और पद्मरागमणिकी-सी आभावाले चारों बालक इस पुण्यके ही फल हैं॥ ५॥

राग आसावरी [ ३० ]

छँगन मँगन अँँगना खेलत चारु चारचो भाई। सानुज भरत लाल लषन राम लोने लोने लरिका लखि मुदित मातुसमुदाई ॥ १ ॥ बाल बसन भूषन धरे, नख-सिख छबि छाई। नील पीत मनसिज-सरसिज मंजुल मालनि मानो है देहनितें दुति पाई ॥ २ ॥ ठुमुकु ठुमुकु पग धरनि, नटनि, लरखरनि सुहाई। भजनि, मिलनि, रूठनि, तूठनि, किलकनि, अवलोकनि, बोलनि बरनि न जाई ॥ ३ ॥ जननि सकल चहुँ ओर आलबाल मनि-अँगनाई। दसरथ-सुकृत बिबुध-बिरवा बिलसत बिलोकि जनु बिधि बर बारि बनाई ॥ ४ ॥

गीतावली ७० हरि बिरंचि हर हेरि राम प्रेम-परबसताई। सुख-समाज रघुराजके बरनत बिसुद्ध मन सुरनि सुमन झरि लाई ॥ ५ ॥ सुमिरत श्रीरघुबरनिकी लीला लरिकाई। तुलसिदास अनुराग अवध आनँद अनुभवत तब को सो अजहुँ अघाई ॥ ६ ॥ अति सुन्दर चारों भाई मगन होकर आँगनमें खेल रहे हैं। भाई शत्रुघ्नके सहित भरतलाल, लक्ष्मण तथा राम—इन सुन्दर बालकोंको देख-देखकर सब माताएँ अति आनन्दित होती हैं ॥१॥ चारों बालक बालोचित वस्त्र और आभूषण धारण किये हुए हैं, नखसे शिखतक शोभा छायी हुई है। कामदेवकी, नील और पीत कमलकी मनोहर मालाओंने मानों इनके शरीरोंसे ही शोभा पायी है ॥ २ ॥ इनके ठुमक-ठुमककर चरण रखने, नाचने, लड़खड़ाने, दौड़ने, मिलने, रूठने, प्रसन्न होने, किलकने, देखने तथा बोलनेकी सुन्दरताका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ३ ॥ राजभवनके मणि- मय आँगनरूप आलबालमें दशरथजीके पुण्य-कल्पतरुको बढ़ाता देख मानों विधाताने समस्त माताओंको सुन्दर बाड़ बनाकर उसे चारों ओरसे घेर दिया है ॥४॥ ब्रह्मा-विष्णु और महादेव भगवान् रामकी प्रेम-परवशता देख विशुद्ध मनसे रघुराज (दशरथजी) की सुखराशिका वर्णन करते हैं। देवताओंने फूलोंकी झड़ी लगा रखी है ॥ ५ ॥ उन रघुकुलश्रेष्ठ बालकोंकी बाललीलाओंका स्मरण कर तुलसीदासजी उस समयकी ही भाँति अब भी अयोध्यामें अघाकर उस अनुरागके आनन्दका अनुभव कर रहे हैं ॥ ६ ॥

७१ बालकाण्ड राग बिलावल [ ३१ ] आँगन खेलत आनँदकंद। रघुकुल-कुमुद-सुखद चारुचंद ॥ १ ॥ सानुज भरत लषन संग सोहैं। सिसु-भूषन भूषित मन मोहैं। तन-दुति मोरचंदजिनि झलकें। मनहु उमगि अँग-अँग छबि छलकें ॥ २ ॥ कटि किंकिनि पग पँजनि बाजैं। पंकज पानि पहुँचीआँ राजैं। कठुला कंठ बघनहा नीके। नयन-सरोज-मयन-सरसीके ॥ ३ ॥ लटकन लसत ललाट लटूरीं। दमकति द्वै द्वै दँतुरियाँ रूरीं ॥ मुनि-मन हरत मंजु मसि बुंदा। ललित बदन बलि बालमुकुंदा ॥ ४ ॥ कुलही चित्र बिचित्र झँगूलीं। निरखत मातु मुदित मन फूलीं ॥ गहि मनिखंभ डिंभ डगि डोलत। कलबल बचन तोतरे बोलत ॥ ५ ॥ किलकत, झुकि झाँकत प्रतिबिंबनि। देत परम सुख पितु अरु अँबनि ॥ सुमिरत सुखमा हिय हुलसी है। गावत प्रेम-पुलकि तुलसी है ॥ ६ ॥ रघुकुलरूप कुमुदको आनन्दित करनेवाले मनोहर मयंक आनन्दकन्द भगवान् राम आँगनमें खेल रहे हैं ॥ १ ॥ शत्रुघ्नसहित भरत और लक्ष्मणजी सङ्गमें सुशोभित हैं; चारों भाई बालोचित आभूषणोंसे भूषित हैं और मनको मोहे लेते हैं। शरीरकी कान्ति ऐसी है मानों मयूरपिच्छकी चन्द्रिकाएँ झलक रही हों तथा अङ्ग- अङ्गसे छवि मानों उमँग-उमँगकर छलकी पड़ती हो ॥ २ ॥ कमरमें करधनीकी और चरणोंमें नूपुरकी ध्वनि हो रही है, करकमलमें पहुँचियाँ शोभा दे रही हैं। कण्ठमें कठुला तथा व्याघ्रनख सुन्दर मालूम होते हैं तथा नयनकमल मानों कामसरोवरसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३ ॥ माथेपर छोटी-छोटी अलकें तथा [ सुवर्णमय ] लटकन

गीतावली ७२ शोभायमान है और मुखमें दो-दो छोटे-छोटे सुन्दर दाँत दमक रहे हैं। [ माथेपर लगी हुई ] काजलकी मनोहर बिन्दी मुनियोंका मन चुराये लेती है। इस बालमुकुन्दके मनोहर मुखारविन्दपर बलिहारी है ॥ ४ ॥ रङ्ग-बिरङ्गी टोपी और अनूठी झँगुली (अंगा) देखकर माता प्रसन्न मनसे फूली फिर रही है। बालक राम मणिमय खम्भ पकड़कर पैरोंसे डगमगाते हुए चलते हैं और अस्पष्ट तथा मनोहर तोतले वचन बोलते हैं ॥ ५ ॥ वे किलकते हैं और झुक-झुककर अपने प्रतिबिम्बोंकी ओर ताकते हैं। इस प्रकार माता-पिताको खूब ही आनन्द प्रदान करते हैं। उस सुन्दरताके स्मरणमात्रसे हृदयमें उल्लास होता है और तुलसीदास भी प्रेमसे पुलकित हो उसका गान करता है ॥ ६ ॥ राग कान्हरा [ ३२ ] ललित सुतहि लालति सचु पाये। कौसल्याकल कनक अजिर महँ सिखवति चलन अँगुरियाँ लाये ॥ १ ॥ कटि किंकिनी, पैजनी पाँयनि बाजति रुनझुन मधुर रेंगाये। पहुँची करनि, कंठ कठुला बन्यो केहरि नख मनि-जरित जराये ॥ २ ॥ पीत पुनीत बिचित्र झँगुलिया सोहति स्याम सरीर सोहाये। दँतियाँ द्वै द्वै मनोहर मुखछबि, अरुन अधर चित लेत चोराये ॥ ३ ॥ चिबुक कपोल नासिका सुन्दर, भाल तिलक मसिबिंदु बनाये। राजत नयन नयन मंजु अंजनजुत खंजन कंज मीन मद नाये ॥ ४ ॥ लटकन चारु भ्रुकुटिया टेढ़ी, मेढ़ी सुभग सुदेस सुभाये। किलकि किलकि नाचत चुटकीसुनि, डरपति जननिपानिछुटकाये ॥ ५ ॥ गिरि घुटुरुवनि टेकि उठि अनुजनि तोतरि बोलत पूप देखाये। बाल केलि अवलोकि मातु सब मुदित मगन आनँद न अमाये ॥ ६ ॥

देखत नभ घन-ओट चरित मुनि जोग समाधि बिरति बिसराये। तुलसिदास जे रसिक न यहि रस ते नर जड जीवत जग जाये ॥ ७ ॥ कौसल्याजी आनन्दित होकर अपने मनोहर लालका लालन करती हैं, अपने सुवर्णमय आँगनमें वे अँगुली पकड़कर उसे चलना सिखाती हैं ॥ १ ॥ [धीरे-धीरे] रेंगानेपर उनकी कमरमें किङ्किणी और चरणोंमें पैंजनीका मधुर शब्द होता है। उनके हाथोंमें पहुँची और कण्ठमें कठुला तथा मणियोंसे जड़ा हुआ व्याघ्रनख शोभायमान है ॥ २ ॥ उनके अति सुन्दर श्याम शरीरपर पीले रङ्गकी बड़ी अनूठी और पवित्र झँगुलिया सुशोभित है। दो-दो दाँतोंसे युक्त मनोहर मुखछबि तथा अरुण अधर मानों चित्तको चुराये लेते हैं ॥ ३ ॥ उनकी ठोड़ी, कपोल और नासिका अति सुन्दर हैं तथा माथेपर तिलक और और काजलकी बिन्दी लगी हुई है। उनके अञ्जन-रञ्जित मनोहर नयन ऐसे शोभायमान हैं कि उन्होंने खञ्जन, कमल और मीनका मद भी चूर कर दिया है ॥ ४ ॥ माथेपर मनोहर लटकन है, बाँकी भ्रुकुटियाँ हैं तथा सिरपर सुन्दर गुँथी हुई चोटी विराजमान है। माताकी चुटकी सुनकर वे किलक-किलककर नाचने लगते हैं तब हाथ छुड़ा लेनेपर [गिर न पड़ें, इस भयसे] माता डरने लगती है ॥ ५ ॥ गिर पड़नेपर घुटने टेककर पुनः उठते हैं और जब माता पूआ दिखाती हैं तो तोतली बोलीमें अपने छोटे भाइयोंको बुलाने लगते हैं। इस प्रकारकी बाललीलाएँ देखकर सब माताएँ प्रेममें डूब जाती हैं। उनके हृदयमें आनन्द नहीं समाता ॥ ६ ॥ मुनिजन भी योग, समाधि और वैराग्यको भूलकर बादलोंकी ओटसे यह सब चरित्र देखते हैं। तुलसीदास कहते हैं, जो लोग इस रसके रसिक नहीं हैं वे जड़ इस संसारमें व्यर्थ ही जीवन धारण करते हैं ॥ ७ ॥

गीतावली ७४ राग ललित [ ३३ ] छोटी छोटी गोड़ियाँ अँगुरियाँ छबीलीं छोटी, नख-जोति मोती मानो कमल-दलनिपर । ललित आँगन खेलैं, ठुमुकु ठुमुकु चलैं, झुँझुनु झुँझुनु पाँय पैंजनी मृदु मुखर ॥ १ ॥ किंकिनी कलित कटि हाटक जटिल मनि, मंजु कर-कंजनि पहुँचियाँ रुचिरतर । पियरी झीनी झँगुली साँवरे सरीर खुली, बालक दामिनि ओढ़ी मानो बारे बारिधर ॥ २ ॥ उर बघनहा, कंठ कठुला, झँडूले केश, मेढ़ी लटकन मसिबिंदु मुनि-मन-हर । अंजन-रंजित नैन, चित चोरैं चितवनि, मुख-सोभापर वारौं अमित असमसर ॥ ३ ॥ चुटकी बजावती नचावती कौसल्या माता, बालकेलि गावति मलहावति सुप्रेम-भर । किलकि किलकि हँसैं, द्वै द्वै दँतुरियाँ लससैं, तुलसीके मन बसैं तोतरे बचन वर ॥ ४ ॥ छोटे-छोटे चरण हैं, उनमें नन्हीं-नन्हीं छबीली अँगुलियाँ हैं, जिनकी नखद्युति ऐसी जान पड़ती है मानो कमलदलपर मोती सुशोभित हों। मनोहर आँगनमें खेलते समय जब ठुमुक-ठुमुक चलते हैं तो पैरोंसे पैंजनियोंका सुमधुर झुनझुन-झुनझुन शब्द होता है ॥ १ ॥ कमरमें सुवर्णकी मनिजटित मनोहर किङ्किणी है तथा हाथों में अति सुन्दर पहुँचियाँ हैं। साँवरे शरीरपर अति झीनी पीतवर्ण

७५ बालकाण्ड झंगुलियाँ ऐसी शोभित होती हैं मानो किसी छोटे बादलने बाल- विद्युत् ओढ़ रक्खी हो ॥ २ ॥ छातीपर व्याघ्रनख है, कण्ठमें कठुला पड़ा हुआ है तथा माथेपर मुनियोंके मनको चुरानेवाले गंभुआरे केश, चोटी, लटकन और काजलकी बिन्दी विराजमान हैं। भगवान्‌के नयन अञ्जनरञ्जित हैं, उनकी चितवन चित्तको चुराये लेती है, उनकी मुखछबिपर तो मैं अनन्त कामदेवोंको निछावर करता हूँ ॥ ३ ॥ माता कौसल्या चुटकी बजा-बजाकर नचाती हैं और प्रेममें भरकर बाललीला गाती हुई दुलारती हैं। भगवान् किलक-किलककर हँसते हैं, उनके मुखमें दो-दो दाँत शोभायमान हैं। तुलसीदासके हृदयमें उनके अति मनोहर तोतले वचन बसे हुए हैं ॥ ४ ॥ [ ३४ ] सादर सुमुखि बिलोकि राम-सिसुरूप, अनूप भूप लिये कनियाँ । सुंदर स्याम सरोज बरन तनु, नखसिख सुभग सकल सुखदनियाँ ॥ १ ॥ अरुन चरन नखजोति जगमगति, रनभुनु करति पाँय पेंजनियाँ । कनक-रतन-मनि जटित रटति कटि किँकिनि कलित पीतपट तनियाँ ॥ २ ॥ पहुँची करनि, पदिक हरिनख उर, कठुला कंठ, मंजु गजमनियाँ । रुचिर चिबुक, रद, अधर मनाहर, ललित नासिका लसति नथुनियाँ ॥ ३ ॥ बिकट भ्रकुटि, सुखमानिधि आनन, कल कपोल, काननि नगफनियाँ । भाल तिलक मसि बिंदु विराजत, सोहति सीस लाल चौतनियाँ ॥ ४ ॥ मनमोहनी तोतरी बोलनि, मुनि-मन-हरनि हँसनि किलकनियाँ । बाल सुभाय बिलोल बिलोचन, चोरति चितहि चारु चितवनियाँ ॥ ५ ॥

गीतावली ७६ सुनि कुलबधू झरोखनि झाँकति रामचंद्र-छबि चंदबदनियाँ । तुलसिदास प्रभु तेखि मगन भईं प्रेमबिबस कछु सुधि न अपनियां ॥ ६ ॥ [कोई सखी कहती है—] अरी सुमुखि ! महाराज दशरथ रामको गोदमें लिये हुए हैं, तू आदरपूर्वक उनका अनुपम रूप तो देख । उनका शरीर अति सुन्दर नील कमलकी-सी आभावाला है तथा वे नखशिखसे अति सुन्दर और सब प्रकारके सुख देनेवाले हैं ॥ १ ॥ उनके अरुण चरणोंमें नखोंकी ज्योति जगमगा रही है, पैरोंमें पैंजनियाँ रुनझुन शब्द करती हैं, कमरमें मणि और रत्नजटित सुवर्णमयी किङ्किणी झनकार कर रही है तथा शरीरमें पीताम्बर सुशोभित है ॥ २ ॥ इसी प्रकार हाथोंमें पहुँची, छातीपर पदिक और व्याघ्रनख तथा कण्ठमें कठुला और मनोहर गजमुक्ता शोभाय- मान हैं। भगवान्‌के चिबुक, दाँत और ओठ अत्यन्त मनोहर हैं तथा उनकी सुन्दर नासिकामें नथुनी सुशोभित है ॥ ३ ॥ प्रभुकी भ्रुकुटि विकट, मुखमण्डल सुन्दरताकी निधि तथा कपोल अति सुन्दर हैं। उनके कानोंमें नागफनी (कर्णभूषणविशेष) तथा मस्तकपर तिलक और काजलकी बिन्दी विराजमान है एवं सिरपर लाल चौतनी टोपी सुशोभित है ॥ ४ ॥ उनकी मनमोहिनी तोतली बोली, हँसी और किलकारी मुनियोंके मनको हर लेनेवाली हैं तथा बालोचित चञ्चलता- युक्त नयन और सुन्दर चितवन चित्तको चुराये लेते हैं ॥ ५ ॥ सखीके ये वचन सुनकर चन्द्रमुखी कुलकामिनीयाँ झरोखोंमें से रामचन्द्रकी छबि निहारती हैं। तुलसीदासजी कहते हैं प्रभुको देखकर वे सब प्रेममें मग्न हो गयीं । प्रेमपरवश हो जाने कारण उन्हें अपनी कुछ भी सुध न रही ॥ ६ ॥

७७ बालकाण्ड राग बिलावल [ ३५ ] सोहत सहज सुहाये नैन । खंजन मीन कमल सकुचत तब जब उपमा चाहत कबि दैन ॥ १ ॥ सुंदर सब अंगनि सिसु-भूषन राजत जनु सोभा आये लैन । बड़ो लाभ, लालची लोभबस रहि गयो लखि सुखमा बहु मैन ॥ २ ॥ भोर भूप लिये गोद मोद भरे, निरखत बदन, सुनत कल बैन । बालक-रूप अनूप राम-छबि निवसत तुलसीदास-उर-ऐन ॥ ३ ॥ भगवान्‌के स्वभावसे ही सुन्दर नयन शोभायमान हैं। जिस समय कवि उनकी उपमा देना चाहता है, उस समय खञ्जन, मीन और कमल सकुचा जाते हैं ॥ १ ॥ भगवान्‌के सम्पूर्ण सुन्दर अङ्गों- में बालोचित आभूषण शोभायमान हैं, मानो उनसे शोभा लेनेके लिये अत्यन्त लालची कामदेव ही अनेक रूप धारण कर वहाँ आया हो और बहुत लाभ जानकर अत्यन्त शोभा देख लोभवश वहीं रह गया हो ॥ २ ॥ प्रातःकाल होते ही राजाने आनन्दमें भरकर उन्हें गोदमें उठा लिया और उनका मुख निहारने तथा मनोहर वचन सुनने लगे। बालरूप भगवान् रामकी अनुपम छवि सर्वदा तुलसीदासजीके हृदय- मन्दिरमें निवास करती है ॥ ३ ॥ राग बिभास [ ३६ ] भोर भयो जागहु, रघुनन्दन ! गत-व्यलीक भगतनि उर-चंदन ॥ १ ॥ ससि करहीन, छीन दुति तारे। तमचुर मुखर, सुनहु मेरे प्यारे ॥ २ ॥ बिकसित कंज, कुमुद बिलखाने । लै पराग रस मधुप उड़ाने ॥ ३ ॥

गीतावली ७८ अनुज सखा सब बोलनि आये । बंदिन्ह अति पुनीत गुन गाये ॥ ४ ॥ मनभावतो कलेऊ कींजै । तुलसिदास कहँ जूठनि दीजै ॥ ५ ॥ [माता कहती है—] हे रघुनन्दन ! सबेरा हो गया, अब उठ बैठो । तुम कपटरहित भक्तोंके हृदयके चन्दन (शीतलता प्रदान करने- वाले) हो ॥ १ ॥ चन्द्रमाकी किरणें फीकी पड़ गयीं और तारे तेजहीन हो गये। हे मेरे प्यारे ! सुनो, कुक्कुट (मुर्ग) बोलने लगे ॥ २ ॥ कमल खिल गये, कुमुदगण मुरझा गये तथा भ्रमरवृन्द पराग एवं रस (मकरन्द) लेकर उड़ गये ॥ ३ ॥ देखो, तुम्हारे सब अनुज और मित्रगण बुलाने आये हैं तथा बन्दीजन अति पवित्र गुणगाथा गा रहे हैं ॥ ४ ॥ अब तुम मनभाता कलेऊ करो और तुलसीदासको अपनी जूठन दो ॥ ५ ॥ [ ३७ ] प्रात भयो तात, बलि मातु बिधु-बदनपर मदन वारौं कोटि, उठौ प्रानप्यारे ! सूत-मागध-बंदि बदत बिरुदावली, द्वार सिसु अनुज प्रियतम तिहारे ॥ १ ॥ कोक गतसोक अवलोकि ससि छीनछबि, अरुनमय गगन राजत रुचि तारे। मनहुँ रबि बाल मृगराज तमनिकर-करि दलित, अति ललित मनिगन बिथारे ॥ २ ॥ सुनहु तमचुर मुखर, कीर कलहंस पिक केकि रव कलित, बोलत बिहँग बारे। मनहुँ मुनिबृन्द रघुबंसमनि ! रावरे गुनत गुन आश्रमनि सपरिवारे ॥ ३ ॥

सरनि बिकसित कंजपुंज मकरन्दबर, मंजुतर मधुर मधुकर गुंजारे। मनहुँ प्रभुजनम सुनि चैन अमरावती, इन्दिरासन्द-मन्दिर सँवारे ॥ ४ ॥ प्रेम-संमिलित बर बचन-रचना श्रकनि राम राजीव-लोचन उघारे। दास तुलसी मुदित, जननि करें आरती, सहज सुन्दर अजिर पाँव धारे ॥ ५ ॥ हे आत ! सबेरा हो गया, माता बलिहारी जाती है। प्राण- प्यारे लाल ! अब उठो। मैं तुम्हारे मुखचन्द्रपर करोड़ों कामदेवोंको निछावर करती हूँ। देखो सूत, मागध और वन्दीजन तुम्हारी विरदावली गा रहे हैं तथा द्वारपर तुम्हारे अनुज और प्रियतम साथी बालक खड़े हैं ॥ १ ॥ चन्द्रमाकी कान्तिको मन्द हुई देख चकवा-चकवीका शोक दूर हो गया तथा अरुण आकाशमें तारागण ऐसे जान पड़ते हैं, मानो सूर्यरूप बाल मृगराजने अन्धकाररूप गजराजको दलित कर उसके अत्यन्त सुन्दर मुक्ताफल बिखेर दिये हों ॥ २ ॥ सुनो, कुक्कुट, शुक, कलहंस, कोयल और मयूर तथा पक्षियोंके बच्चे कैसा सुन्दर कलरव कर रहे हैं। हे रघुवंशमणि ! वे ऐसे जान पड़ते हैं मानों मुनि- जन अपने आश्रमोंमें परिवारसहित आपका गुणगान कर रहे हों ॥ ३ ॥ सरोवरोंमें कमलसमूह विकसित हो रहे हैं; उनके श्रेष्ठ मकरन्दके लिये अति मनोहर मधुकर सुमधुर गुञ्जार कर रहे हैं, मानो प्रभुका जन्मवृत्तान्त सुन इन्द्रलोकमें उत्सव हो रहा है और श्रीलक्ष्मी- जीने अपने आनन्दभवन सजाये हैं ॥ ४ ॥ यह प्रेममिश्रित मनोहर

गीतावली ८० वचनावलि सुन भगवान् रामने अपने कमल-नयन खोले। तुलसीदासजी कहते हैं—जिस समय स्वभावसे ही सुन्दर भगवान् रामने आँगनमें पाँव रखे उस समय माता प्रसन्नचित्तसे आरती करने लगी ॥ ५ ॥ [ ३८ ] जागिये कृपानिधान जानराय रामचन्द्र जननी कहै बार-बार भोर भयो प्यारे । राजिवलोचन बिसाल, प्रीति-बापिका मराल, ललित कमल-बदन ऊपर मदन कोटि वारे ॥ १ ॥ अरुन उदित, बिगत सरबरी, ससांक किरनहीन, दीन दीपजोति, मलिन, दुति समूह तारे । मनहुँ ग्यानघन-प्रकास, बीते सब भव-बिलास आस-त्रास तिमिर तोष-तरनि-तेज जारे ॥ २ ॥ बोलत खगनिकर मुखर मधुर करि प्रतीत सुनहु श्रवन, प्रानजीवन धन, मेरे तुम बारे । मनहुँ बेद-बन्दी-मुनिबृन्द-सूत-मागधादि बिरुद बदत 'जय जय जय जयति कैटभारे' ॥ ३ ॥ बिकसित कमलावली, चले प्रपुंज चञ्चरीक, गुंजत कल कोमल धुनि त्यागि कंज न्यारे । जनु बिराग पाइ सकल सोक-कूप गृह बिहाइ भृत्य प्रेममत्त फिरत गुनत गुन तिहारे ॥ ४ ॥ सुनत बचन प्रिय रसाल जागे अतिसय दयाल भागे जंजाल बिपुल, दुख-कदंब दारे । तुलसिदास अति अनन्द पेखिकै मुखारबिंद, छूटे भ्रमफंद परम मंद द्वंद भारे ॥ ५ ॥

८१ बालकाण्ड माता बार-बार कहती है—हे सुजान-शिरोमणि कृपानिधान रामचन्द्र ! जागो । प्यारे ! देखो, सबेरा हो गया । आप कमलके समान विशाल नयनोंवाले तथा प्रेमरूप वापीके हंस हैं। आपके मनोहर मुखारविन्दपर करोड़ों कामदेव निछावर हैं ॥ १ ॥ देखो, बालसूर्य उदित हुआ है; रात्रि बीत चुकी है, चन्द्रमा किरणहीन हो चला है, दीपकका प्रकाश मन्द पड़ गया है और तारामण्डलकी ज्योति फीकी पड़ गयी है, मानों ज्ञानका घन प्रकाश होनेपर सम्पूर्ण भवविलास शान्त हो गये हों तथा आशा और भयरूप अन्धकारको सन्तोषरूप सूर्यके तेजने दग्ध कर दिया हो ॥ २ ॥ हे मेरे प्यारे प्राणजीवनधन पुत्र ! तुम कान लगाकर सुनो । देखो, ये जो मुखर पक्षिसमूह मधुर शब्द कर रहे हैं, सो ऐसे जान पड़ते हैं, मानो वेद, वन्दीजन, मुनिवृन्द, सूत और मागध आदि 'हे कैटभारे ! तुम्हारी जय हो, जय हो' ऐसा कहकर विरदका बखान करते हों ॥ ३ ॥ देखो, कमलवृन्द खिल गये और [ उनमें सायङ्कालको मुंदे हुए ] भ्रमरगण उन्हें छोड़कर सुमधुर ध्वनि करते हुए अलग-अलग चल दिये, जैसे वैराग्य होनेपर आपके प्रेमोन्मत्त सेवक सब प्रकारके शोकोंके कूपरूप घरको त्याग कर आपका गुणगान करते फिरते हैं ॥ ४ ॥ माताके ये अति मधुर और प्रिय वचन सुनते ही अतिशय दयालु भगवान् राम जग पड़े । इससे सारे जञ्जाल दूर हो गये तथा सब प्रकारके दुःखसमूह दलित हो गये । तुलसीदास कहते हैं, भगवान्‌का मुखारविन्द देखकर सभी भक्तजन अति आनन्दित हुए और उनके भ्रमजनित बन्धन छूट गये एवं राग-द्वेषादि भारी द्वन्द्व अत्यन्त मन्द हो गये ॥ ५ ॥ गी० ६—

गीतावली ८२ [ ३९ ] बोलत अवनिप-कुमार ठाढ़े नृपभवन-द्वार, रूप-सील-गुन उदार जागहु मेरे प्यारे। बिलखित कुमुदनि, चकोर, चक्रवाक हरष भोर, करत सोर तमचुर खग, गुंजत अलि न्यारे॥ १ ॥ रुचिर मधुर भोजन करि, भूषन सजि सकल अंग, संग अनुज बालक सब बिबिध बिधि सँवारे। करतल गहि ललित चाप भंजन रिपु-निकर-दाप, कटितट पटपीत, तून सायक अनियारे॥ २ ॥ उपबन मृगया-बिहार-कारन गवने कृपाल, जननी मुख निरखि पुन्यपुंज निज बिचारे। तुलसिदास संग लीजै, जानि दीन अभय कीजै दीजै मति बिमल गावै चरित बर तिहारे॥ ३ ॥ महाराज दशरथके राजभवनके द्वारपर खड़े हुए अन्य राजकुमार पुकारते हैं—'हे रूप, गुण और शील आदिमें उदार, मेरे प्रिय रघुनन्दन ! जागो। देखो [चन्द्रमाके अस्त हो जानेसे] कुमुदिनी और चकोर पक्षी व्याकुल हो रहे हैं, चकवोंको सबेरा हुआ देख बड़ा आनन्द है, कुक्कुट तथा अन्य पक्षी शोर मचा रहे हैं तथा भ्रमर गुञ्जार कर रहे हैं'॥ १ ॥ तब भगवान्‌ने अति स्वादिष्ट और मधुर भोजन कर, सब अङ्गोंको आभूषणोंसे सुसज्जित किया और अनुज तथा अन्य बालकोंको, जो सभी अनेक प्रकारके शृङ्गार किये हुए थे, साथमें लेकर हाथमें शत्रुसमूहका मान मर्दन करनेवाला सुन्दर धनुष ले, कमरमें पीला दुपट्टा और तीखे तीरोंसे भरा हुआ तरकस धारणकर परम कृपालु भगवान् राम मृगया-विहार

८३ बालकाण्ड करनेके लिये उपवनको चले। उस समय उनका मुख निहारकर माताने अपने बड़े पुण्य समझे। तुलसीदासजी कहते हैं—हे नाथ ! मुझे दीन जानकर अभय कीजिये और अपने संग लगा लीजिये। मुझे ऐसी निर्मल बुद्धि दीजिये जिससे मैं आपके पवित्र चरित्र गा सकूँ ॥ २-३ ॥ राग नट [ ४० ] खेलन चलिये आनँदकंद। सखा प्रिय नृपद्वार ठाढ़े बिपुल बालक-बृन्द ॥ १ ॥ तृषित तुम्हरे दरस कारन चतुर चातक-दास। बपुष-बारिद बरषि छबि-जल हरहु लोचन-प्यास ॥ २ ॥ बंधु-बचन बिनीत सुनि उठे मनहु केहरि-बाल। ललित लघु सर-चाप कर, उर-नयन-बाहु बिसाल ॥ ३ ॥ चलत पद प्रतिबिंब राजत अजिर सुखमा-पुंज। प्रेमबस प्रति चरन महि मानो देति आसन कंज ॥ ४ ॥ निरखि परम बिचित्र सोभा चकित चितवहिं मात। हरष-बिबस न जात कहि, 'निज भवन बिहरहु, तात' ॥ ५ ॥ देखि तुलसीदास प्रभु-छबि रहे सब पल रोकि। थकित निकर चकोर मानहुँ सरद इंदु बिलोकि ॥ ६ ॥ हे आनन्दकन्द ! अब खेलनेके लिये चलिये। आपके प्रिय सखा अनेक बालकवृन्द राजद्वारपर खड़े हैं ॥ १ ॥ आपके दर्शनोंके लिये आपके भक्तरूप चतुर चातक अत्यन्त तृषित हैं। आप अपने शरीररूप मेघसे छविरूप जल बरसाकर हमारे नेत्रोंकी पिपासा शान्त कीजिये ॥ २ ॥ भरत आदि भाइयोंकी ऐसी विनीत प्रार्थना सुनकर

गीतावली ८४ भगवान् राम उठे, मानो बालकेसरी हों। उनके करकमलोंमें अति सुन्दर छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं तथा उनके हृदय, नेत्र और बाहु विशाल हैं ॥ ३ ॥ (मणिमय) आँगनमें चलते समय जो प्रभुके चरणोंका अति सुन्दरतामय प्रतिबिम्ब पड़ता है सो ऐसा जान पड़ता है, मानो पृथ्वी परम प्रेमवश पद पदपर कमलका आसन देती है ॥ ४ ॥ उसकी अत्यन्त विचित्र सुन्दरता देखकर माताएँ चकित होकर निहारती हैं। उस समय हर्षवश उनसे यह भी नहीं कहा जाता कि 'लाल ! अपने घरमें ही खेलो' ॥ ५ ॥ तुलसीदास कहते हैं, उस समय प्रभुकी शोभा देखकर सबने पलक मारना छोड़ दिया, मानो शरच्चन्द्रको देखकर चकोरसमूह थकित हो गया हो ॥ ६ ॥ [ ४१ ] बिहरत अवध-बीथिन राम। संग अनुज अनेक सिसु, नव-नील-नीरद-स्याम ॥ १ ॥ तरुन अरुन-सरोज-पद बनी कनकभय पदत्रान। पीत-पट कटि तून बर, कर ललित लघु धनु-बान ॥ २ ॥ लोचननिको लहत फल छबि निरखि पुर-नर-नारि। बसत तुलसीदास उर अवधेसके सुत चारि ॥ ३ ॥ सङ्गमें भरत आदि अनुज तथा अनेक बालकोंको लिये नवीन नील मेघके समान श्यामशरीर भगवान् राम अयोध्याकी गलियोंमें विहार कर रहे हैं ॥ १ ॥ उनके नवीन लाल कमलसदृश चरणोंमें सुनहरी जूतियाँ सुशोभित हैं, कमरमें पीताम्बर तथा श्रेष्ठ तरकस है और हाथोंमें अति सुन्दर छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं ॥ २ ॥ उनकी

८५ बालकाण्ड छवि निहारकर नगरके नर-नारी अपने नेत्रोंका फल पाते हैं। तुलसीदासके हृदयमें अयोध्यापति महाराज दशरथके चारों बालक विराजते हैं ॥ ३ ॥ [ ४२ ] जैसे राम ललित तैसे लोने लषन लालु । तैसेई भरत सील-सुषमा-सनेह-निधि, तैसेई सुभग सँग सत्रुसालु ॥ १ ॥ धरे धनु-सर कर, कसे कटि तरकसी, पीरे पट ओढ़े चले चारु चालु । अंग अंग भूषन जरायके जगमगत, हरत जनके जीको तिमिरजालु ॥ २ ॥ खेलत चौहट घाट बीथी बाटकनि प्रभु सिव सुप्रेम-मानस- मरालु । सोभा-दान दै दै सनमानत जाचकजन करत लोक-लोचन निहालु ॥ ३ ॥ रावन-दुरित-दुख दलैं सुर कहैं आजु 'अवध सकल सुखको सुकालु ।' तुलसी सराहें सिद्ध सुकृत कौसल्याजूके, भूरि-भाग-भाजन भुवालु ॥ ४ ॥ जैसे सुन्दर भगवान् राम हैं वैसे ही मनोहर लषनलाल भी हैं तथा वैसे ही शील, सुषमा और स्नेहके भण्डार श्रीभरतजी हैं और उनके साथ वैसे ही सुन्दर श्रीशत्रुघ्नजी भी हैं ॥ १ ॥ चारों भाई हाथमें धनुष-बाण लिये, कमरमें तरकस कसे तथा पीताम्बर ओढ़े अति मनोहर चाल चलते हैं । उनके अङ्ग-अङ्गमें जड़ाऊ आभूषण जगमगाते हैं, जो भक्तोंके हृदयका अन्धकार समूह हर लेते हैं ॥२॥