गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 91, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें८५ बालकाण्ड छवि निहारकर नगरके नर-नारी अपने नेत्रोंका फल पाते हैं। तुलसीदासके हृदयमें अयोध्यापति महाराज दशरथके चारों बालक विराजते हैं ॥ ३ ॥ [ ४२ ] जैसे राम ललित तैसे लोने लषन लालु । तैसेई भरत सील-सुषमा-सनेह-निधि, तैसेई सुभग सँग सत्रुसालु ॥ १ ॥ धरे धनु-सर कर, कसे कटि तरकसी, पीरे पट ओढ़े चले चारु चालु । अंग अंग भूषन जरायके जगमगत, हरत जनके जीको तिमिरजालु ॥ २ ॥ खेलत चौहट घाट बीथी बाटकनि प्रभु सिव सुप्रेम-मानस- मरालु । सोभा-दान दै दै सनमानत जाचकजन करत लोक-लोचन निहालु ॥ ३ ॥ रावन-दुरित-दुख दलैं सुर कहैं आजु 'अवध सकल सुखको सुकालु ।' तुलसी सराहें सिद्ध सुकृत कौसल्याजूके, भूरि-भाग-भाजन भुवालु ॥ ४ ॥ जैसे सुन्दर भगवान् राम हैं वैसे ही मनोहर लषनलाल भी हैं तथा वैसे ही शील, सुषमा और स्नेहके भण्डार श्रीभरतजी हैं और उनके साथ वैसे ही सुन्दर श्रीशत्रुघ्नजी भी हैं ॥ १ ॥ चारों भाई हाथमें धनुष-बाण लिये, कमरमें तरकस कसे तथा पीताम्बर ओढ़े अति मनोहर चाल चलते हैं । उनके अङ्ग-अङ्गमें जड़ाऊ आभूषण जगमगाते हैं, जो भक्तोंके हृदयका अन्धकार समूह हर लेते हैं ॥२॥