भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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गीतावली ८६ भगवान् शङ्करके सुप्रेमरूपी मानसरोवरके हंस प्रभु राम बाजार, घाट, गली और वाटिकाओंमें खेलते फिरते हैं । वे शोभारूप दान देकर अपने अनुरक्त याचकोंका सम्मान करते हैं तथा लोगोंके नेत्रोंको निहाल करते हैं ॥ ३ ॥ देवतालोग कहते हैं, आज अयोध्यामें तो सब प्रकार सुखमय सुकाल है, किन्तु अब रावणरूप दुरित-दुःखका दलन होना चाहिये । तुलसीदास कहते हैं कि महाभाग्यशाली महाराज दशरथ और कौसल्याजीके सुकृतोंकी सिद्धजन भी सराहना करते हैं ॥ ४ ॥ राग ललित [ ४३ ] ललित-ललित लघु-लघु धनु-सर कर, तैसी तरकसी कटि कसे, पट पियरे । ललित पनही पाँय पैंजनी-किंकिनि-धुनि, सुनि सुख लहै मनु, रहै नित नियरे ॥ १ ॥ पहुँची अंगद चारु, हृदय पदिक हारु, कुंडल-तिलक-छबि गड़ी कबि जियरे । सिरसि टिपारो लाल, नीरज-नयन बिसाल, सुंदर बदन, ठाढ़े सुरतरु सियरे ॥ २ ॥ सुभग सकल अंग, अनुज बालक संग, देखि नर-नारि रहें ज्यों कुरंग दियरे । खेलत अवध-खोरि, गोली भौंरा चक डोरि, मूरति मधुर बसै तुलसीके हियरे ॥ ३ ॥ भगवान् राम हाथोंमें सुन्दर-सुन्दर छोटे-छोटे धनुष-बाण लिये, कमरमें तरकस कसे तथा पीताम्बर पहने और पैरोंमें सुन्दर जूतियाँ