भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

गीतावली ८४ भगवान् राम उठे, मानो बालकेसरी हों। उनके करकमलोंमें अति सुन्दर छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं तथा उनके हृदय, नेत्र और बाहु विशाल हैं ॥ ३ ॥ (मणिमय) आँगनमें चलते समय जो प्रभुके चरणोंका अति सुन्दरतामय प्रतिबिम्ब पड़ता है सो ऐसा जान पड़ता है, मानो पृथ्वी परम प्रेमवश पद पदपर कमलका आसन देती है ॥ ४ ॥ उसकी अत्यन्त विचित्र सुन्दरता देखकर माताएँ चकित होकर निहारती हैं। उस समय हर्षवश उनसे यह भी नहीं कहा जाता कि 'लाल ! अपने घरमें ही खेलो' ॥ ५ ॥ तुलसीदास कहते हैं, उस समय प्रभुकी शोभा देखकर सबने पलक मारना छोड़ दिया, मानो शरच्चन्द्रको देखकर चकोरसमूह थकित हो गया हो ॥ ६ ॥ [ ४१ ] बिहरत अवध-बीथिन राम। संग अनुज अनेक सिसु, नव-नील-नीरद-स्याम ॥ १ ॥ तरुन अरुन-सरोज-पद बनी कनकभय पदत्रान। पीत-पट कटि तून बर, कर ललित लघु धनु-बान ॥ २ ॥ लोचननिको लहत फल छबि निरखि पुर-नर-नारि। बसत तुलसीदास उर अवधेसके सुत चारि ॥ ३ ॥ सङ्गमें भरत आदि अनुज तथा अनेक बालकोंको लिये नवीन नील मेघके समान श्यामशरीर भगवान् राम अयोध्याकी गलियोंमें विहार कर रहे हैं ॥ १ ॥ उनके नवीन लाल कमलसदृश चरणोंमें सुनहरी जूतियाँ सुशोभित हैं, कमरमें पीताम्बर तथा श्रेष्ठ तरकस है और हाथोंमें अति सुन्दर छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं ॥ २ ॥ उनकी