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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 454 में से

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पृष्ठ 89

८३ बालकाण्ड करनेके लिये उपवनको चले। उस समय उनका मुख निहारकर माताने अपने बड़े पुण्य समझे। तुलसीदासजी कहते हैं—हे नाथ ! मुझे दीन जानकर अभय कीजिये और अपने संग लगा लीजिये। मुझे ऐसी निर्मल बुद्धि दीजिये जिससे मैं आपके पवित्र चरित्र गा सकूँ ॥ २-३ ॥ राग नट [ ४० ] खेलन चलिये आनँदकंद। सखा प्रिय नृपद्वार ठाढ़े बिपुल बालक-बृन्द ॥ १ ॥ तृषित तुम्हरे दरस कारन चतुर चातक-दास। बपुष-बारिद बरषि छबि-जल हरहु लोचन-प्यास ॥ २ ॥ बंधु-बचन बिनीत सुनि उठे मनहु केहरि-बाल। ललित लघु सर-चाप कर, उर-नयन-बाहु बिसाल ॥ ३ ॥ चलत पद प्रतिबिंब राजत अजिर सुखमा-पुंज। प्रेमबस प्रति चरन महि मानो देति आसन कंज ॥ ४ ॥ निरखि परम बिचित्र सोभा चकित चितवहिं मात। हरष-बिबस न जात कहि, 'निज भवन बिहरहु, तात' ॥ ५ ॥ देखि तुलसीदास प्रभु-छबि रहे सब पल रोकि। थकित निकर चकोर मानहुँ सरद इंदु बिलोकि ॥ ६ ॥ हे आनन्दकन्द ! अब खेलनेके लिये चलिये। आपके प्रिय सखा अनेक बालकवृन्द राजद्वारपर खड़े हैं ॥ १ ॥ आपके दर्शनोंके लिये आपके भक्तरूप चतुर चातक अत्यन्त तृषित हैं। आप अपने शरीररूप मेघसे छविरूप जल बरसाकर हमारे नेत्रोंकी पिपासा शान्त कीजिये ॥ २ ॥ भरत आदि भाइयोंकी ऐसी विनीत प्रार्थना सुनकर

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