गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ८२ [ ३९ ] बोलत अवनिप-कुमार ठाढ़े नृपभवन-द्वार, रूप-सील-गुन उदार जागहु मेरे प्यारे। बिलखित कुमुदनि, चकोर, चक्रवाक हरष भोर, करत सोर तमचुर खग, गुंजत अलि न्यारे॥ १ ॥ रुचिर मधुर भोजन करि, भूषन सजि सकल अंग, संग अनुज बालक सब बिबिध बिधि सँवारे। करतल गहि ललित चाप भंजन रिपु-निकर-दाप, कटितट पटपीत, तून सायक अनियारे॥ २ ॥ उपबन मृगया-बिहार-कारन गवने कृपाल, जननी मुख निरखि पुन्यपुंज निज बिचारे। तुलसिदास संग लीजै, जानि दीन अभय कीजै दीजै मति बिमल गावै चरित बर तिहारे॥ ३ ॥ महाराज दशरथके राजभवनके द्वारपर खड़े हुए अन्य राजकुमार पुकारते हैं—'हे रूप, गुण और शील आदिमें उदार, मेरे प्रिय रघुनन्दन ! जागो। देखो [चन्द्रमाके अस्त हो जानेसे] कुमुदिनी और चकोर पक्षी व्याकुल हो रहे हैं, चकवोंको सबेरा हुआ देख बड़ा आनन्द है, कुक्कुट तथा अन्य पक्षी शोर मचा रहे हैं तथा भ्रमर गुञ्जार कर रहे हैं'॥ १ ॥ तब भगवान्ने अति स्वादिष्ट और मधुर भोजन कर, सब अङ्गोंको आभूषणोंसे सुसज्जित किया और अनुज तथा अन्य बालकोंको, जो सभी अनेक प्रकारके शृङ्गार किये हुए थे, साथमें लेकर हाथमें शत्रुसमूहका मान मर्दन करनेवाला सुन्दर धनुष ले, कमरमें पीला दुपट्टा और तीखे तीरोंसे भरा हुआ तरकस धारणकर परम कृपालु भगवान् राम मृगया-विहार