गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ७२ शोभायमान है और मुखमें दो-दो छोटे-छोटे सुन्दर दाँत दमक रहे हैं। [ माथेपर लगी हुई ] काजलकी मनोहर बिन्दी मुनियोंका मन चुराये लेती है। इस बालमुकुन्दके मनोहर मुखारविन्दपर बलिहारी है ॥ ४ ॥ रङ्ग-बिरङ्गी टोपी और अनूठी झँगुली (अंगा) देखकर माता प्रसन्न मनसे फूली फिर रही है। बालक राम मणिमय खम्भ पकड़कर पैरोंसे डगमगाते हुए चलते हैं और अस्पष्ट तथा मनोहर तोतले वचन बोलते हैं ॥ ५ ॥ वे किलकते हैं और झुक-झुककर अपने प्रतिबिम्बोंकी ओर ताकते हैं। इस प्रकार माता-पिताको खूब ही आनन्द प्रदान करते हैं। उस सुन्दरताके स्मरणमात्रसे हृदयमें उल्लास होता है और तुलसीदास भी प्रेमसे पुलकित हो उसका गान करता है ॥ ६ ॥ राग कान्हरा [ ३२ ] ललित सुतहि लालति सचु पाये। कौसल्याकल कनक अजिर महँ सिखवति चलन अँगुरियाँ लाये ॥ १ ॥ कटि किंकिनी, पैजनी पाँयनि बाजति रुनझुन मधुर रेंगाये। पहुँची करनि, कंठ कठुला बन्यो केहरि नख मनि-जरित जराये ॥ २ ॥ पीत पुनीत बिचित्र झँगुलिया सोहति स्याम सरीर सोहाये। दँतियाँ द्वै द्वै मनोहर मुखछबि, अरुन अधर चित लेत चोराये ॥ ३ ॥ चिबुक कपोल नासिका सुन्दर, भाल तिलक मसिबिंदु बनाये। राजत नयन नयन मंजु अंजनजुत खंजन कंज मीन मद नाये ॥ ४ ॥ लटकन चारु भ्रुकुटिया टेढ़ी, मेढ़ी सुभग सुदेस सुभाये। किलकि किलकि नाचत चुटकीसुनि, डरपति जननिपानिछुटकाये ॥ ५ ॥ गिरि घुटुरुवनि टेकि उठि अनुजनि तोतरि बोलत पूप देखाये। बाल केलि अवलोकि मातु सब मुदित मगन आनँद न अमाये ॥ ६ ॥