भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

देखत नभ घन-ओट चरित मुनि जोग समाधि बिरति बिसराये। तुलसिदास जे रसिक न यहि रस ते नर जड जीवत जग जाये ॥ ७ ॥ कौसल्याजी आनन्दित होकर अपने मनोहर लालका लालन करती हैं, अपने सुवर्णमय आँगनमें वे अँगुली पकड़कर उसे चलना सिखाती हैं ॥ १ ॥ [धीरे-धीरे] रेंगानेपर उनकी कमरमें किङ्किणी और चरणोंमें पैंजनीका मधुर शब्द होता है। उनके हाथोंमें पहुँची और कण्ठमें कठुला तथा मणियोंसे जड़ा हुआ व्याघ्रनख शोभायमान है ॥ २ ॥ उनके अति सुन्दर श्याम शरीरपर पीले रङ्गकी बड़ी अनूठी और पवित्र झँगुलिया सुशोभित है। दो-दो दाँतोंसे युक्त मनोहर मुखछबि तथा अरुण अधर मानों चित्तको चुराये लेते हैं ॥ ३ ॥ उनकी ठोड़ी, कपोल और नासिका अति सुन्दर हैं तथा माथेपर तिलक और और काजलकी बिन्दी लगी हुई है। उनके अञ्जन-रञ्जित मनोहर नयन ऐसे शोभायमान हैं कि उन्होंने खञ्जन, कमल और मीनका मद भी चूर कर दिया है ॥ ४ ॥ माथेपर मनोहर लटकन है, बाँकी भ्रुकुटियाँ हैं तथा सिरपर सुन्दर गुँथी हुई चोटी विराजमान है। माताकी चुटकी सुनकर वे किलक-किलककर नाचने लगते हैं तब हाथ छुड़ा लेनेपर [गिर न पड़ें, इस भयसे] माता डरने लगती है ॥ ५ ॥ गिर पड़नेपर घुटने टेककर पुनः उठते हैं और जब माता पूआ दिखाती हैं तो तोतली बोलीमें अपने छोटे भाइयोंको बुलाने लगते हैं। इस प्रकारकी बाललीलाएँ देखकर सब माताएँ प्रेममें डूब जाती हैं। उनके हृदयमें आनन्द नहीं समाता ॥ ६ ॥ मुनिजन भी योग, समाधि और वैराग्यको भूलकर बादलोंकी ओटसे यह सब चरित्र देखते हैं। तुलसीदास कहते हैं, जो लोग इस रसके रसिक नहीं हैं वे जड़ इस संसारमें व्यर्थ ही जीवन धारण करते हैं ॥ ७ ॥