गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ७६ सुनि कुलबधू झरोखनि झाँकति रामचंद्र-छबि चंदबदनियाँ । तुलसिदास प्रभु तेखि मगन भईं प्रेमबिबस कछु सुधि न अपनियां ॥ ६ ॥ [कोई सखी कहती है—] अरी सुमुखि ! महाराज दशरथ रामको गोदमें लिये हुए हैं, तू आदरपूर्वक उनका अनुपम रूप तो देख । उनका शरीर अति सुन्दर नील कमलकी-सी आभावाला है तथा वे नखशिखसे अति सुन्दर और सब प्रकारके सुख देनेवाले हैं ॥ १ ॥ उनके अरुण चरणोंमें नखोंकी ज्योति जगमगा रही है, पैरोंमें पैंजनियाँ रुनझुन शब्द करती हैं, कमरमें मणि और रत्नजटित सुवर्णमयी किङ्किणी झनकार कर रही है तथा शरीरमें पीताम्बर सुशोभित है ॥ २ ॥ इसी प्रकार हाथोंमें पहुँची, छातीपर पदिक और व्याघ्रनख तथा कण्ठमें कठुला और मनोहर गजमुक्ता शोभाय- मान हैं। भगवान्के चिबुक, दाँत और ओठ अत्यन्त मनोहर हैं तथा उनकी सुन्दर नासिकामें नथुनी सुशोभित है ॥ ३ ॥ प्रभुकी भ्रुकुटि विकट, मुखमण्डल सुन्दरताकी निधि तथा कपोल अति सुन्दर हैं। उनके कानोंमें नागफनी (कर्णभूषणविशेष) तथा मस्तकपर तिलक और काजलकी बिन्दी विराजमान है एवं सिरपर लाल चौतनी टोपी सुशोभित है ॥ ४ ॥ उनकी मनमोहिनी तोतली बोली, हँसी और किलकारी मुनियोंके मनको हर लेनेवाली हैं तथा बालोचित चञ्चलता- युक्त नयन और सुन्दर चितवन चित्तको चुराये लेते हैं ॥ ५ ॥ सखीके ये वचन सुनकर चन्द्रमुखी कुलकामिनीयाँ झरोखोंमें से रामचन्द्रकी छबि निहारती हैं। तुलसीदासजी कहते हैं प्रभुको देखकर वे सब प्रेममें मग्न हो गयीं । प्रेमपरवश हो जाने कारण उन्हें अपनी कुछ भी सुध न रही ॥ ६ ॥