गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५ बालकाण्ड शङ्खसदृश ग्रीवामें सुन्दर हार और सुन्दर भुजाओंमें आभूषण पहनाये गये हैं तथा वक्षःस्थलमें मनोहर श्रीवत्सचिह्न, व्याघ्रनख और अनेक मणियोंसे जड़ा हुआ सुवर्णमय पदक सुशोभित है ॥ ३ ॥ प्रभुकी सुन्दर ठोड़ी, दन्तावली, अधरपुट, नासिका, कर्ण और कपोल मुझे बड़े ही प्रिय हैं। भगवान्की मनोहर भृगकुटियाँ करुणरसपूर्ण हैं तथा नेत्र मानो दो कमल ही हैं ॥ ४ ॥ विशाल भालपर अति सुन्दर श्रेष्ठ लट- कन लटके हुए हैं और बाल्यावस्थाका सुन्दर केशकलाप शोभायमान है। वे सब ऐसे जान पड़ते हैं मानो दोनो गुरुओं (बृहस्पति और शुक्र) तथा शनि एवं मङ्गलको आगेकर अन्धकारके समूह चन्द्रमासे मिलने आये हों। [यहाँ लटकनमें जो सुवर्ण है वह बृहस्पति है, हीरा शुक्र है, लाल मङ्गल है और नीलमणि शनि है। उन्हें आगेकर केशकलाप रूप अन्धकारसमूह मुखरूप चन्द्रमासे मिलने आया है] ॥५॥ जिस समय माताने पीताम्बर उढ़ाया उस समय तो अद्भुत उपमा (योग्य शोभा) हो गयी, मानो [श्यामशरीररूप] नील मेघपर [अनेक चमकीले आभूषणरूप] नक्षत्रगण को देदीप्यमान देख (पीताम्बररूप) चञ्चला चपलाने अपना स्वभाव छोड़कर उसे छिपा लिया ॥ ६ ॥ भगवान्के अङ्ग-अङ्गपर मानों कामके समूह अपने छविपुञ्जको लेकर छाये हुए हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीके रूप और गुण यदि विधाताके बनाये हुए हों तो कुछ कहे भी जा सकते हैं ॥ ७॥ राग केदारा [ २७ ] रघुबर बाल छबि कहौं बरनि । सकल सुखकी सींव, कोटि-मनोज-सोभाहरनि ॥ १ ॥ गी० ५—