गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ६४ राग कान्हरा [ २६ ] आँगन फिरत घुटुरुवनि धाए। नील-जलद तनु-स्यामराम सिसुजननि निरखि मुख निकट बोलाए ॥१॥ बंधुक सुमन अरुन पदपंकज अंकुस प्रमुख चिन्ह बनि आए। नूपुर जनु मुनिबर-कलहंसनि रचे नीड़ दै बाँह बसाए ॥२॥ कटिमेखल, बर हार ग्रीव-दर, रुचिर बाँह भूषन पहिराए। उर श्रीवत्स मनोहर हरिनख हेम मध्य मनिगन बहु लाए ॥३॥ सुभाग चिबुक, द्विज, अधर, नासिका, श्रवन, कपोल मोहि अति भाए। भ्रूसुंदर करुणारस-पूरन, लोचन मनहुँ जुगल जलजाए ॥४॥ भाल बिसाल ललित लटकन बर, बालदसाके चिकुर सोहाए। मनु दोउ गुरु सनि कुज आगे करि ससिहि मलिन तमके गन आए ॥५॥ उपमा एक अद्भुत भई तब जब जननी पट पीत ओढ़ापए। नीलजलद पर उडुगन निरखत तजि सुभाव मनो तड़ित छुपाए ॥६॥ अंग-अंगपर मार-निकर मिलि छबि समूह लै लै जनु छाए। तुलसिदास रघुनाथ रूप-गुन तौ कहौं जो बिधि होहिं बनाए ॥७॥ राम आँगनमें घुटनोंके बल दौड़े फिर रहे हैं। नील मेघके समान श्यामशरीर बालक रामका मुख देखकर माताने उन्हें अपने पास बुलाया ॥ १ ॥ दुपहरियाके फूलके समान प्रभुके अरुण चरणकमलोंमें अंकुश आदि प्रमुख चिह्न सुशोभित हैं तथा उनमें जो नूपुर हैं, वे ऐसे जान पड़ते हैं, मानो भगवान्ने घोंसले रचकर उनमें मुनिजनरूप कलहंसोंको शरण देकर बसाया है ॥२॥ प्रभुके कटिप्रदेशमें मेखला,