गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ५४ धार) प्रेमसहित पान करते हैं और आनन्दपूर्वक जीवन-यापन करते हैं ॥३॥ [ २१ ] सुखनींद कहति आलि आइहौं। राम, लखन, रिपुदवन, भरत सिसु करि सब सुमुख सोआइहौं ॥ १ ॥ रोवनि, धोवनि, अनखानि, अनरसनि, डिठि-मुठि निठुर नसाइहौं। हँसनि, खेलनि, किलकनि, आनंदनि भूपति-भवन बसाइहौं ॥ २ ॥ गोद बिनोद-मोदमय मूरति हरषि हरषि हलराइहौं। तनु तिल तिल करि, वारि रामपर लेहौं रोग बलाइहौं ॥ ३ ॥ रानी-राउ सहित सुत-परिजन निरखि नयन-फल पाइहौं। चारु चरित रघुबंस-तिलकके तहँ तुलसी मिलि गाइहौं ॥ ४ ॥ आनन्दनिद्रा कहती है—आली ! मैं आऊँगी और बालक राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नको प्रसन्न करके सुलाऊँगी ॥१॥ मैं रोना-धोना, अनखाना, मचलाना और कड़ी नजर तथा टोनेको नष्ट कर दूँगी और हँसने, खेलने, किलकने तथा आनन्दित होनेकी क्रियाको महाराजके महलमें बसाऊँगी ॥२॥ रामकी विनोद और आनन्दमयी मूर्तिको गोदमें लेकर प्रसन्न मनसे हिलाऊँगी और अपने शरीरको रामललापर तिल-तिल निछावर कर उनके सारे रोग