गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ५८ पुरवासियोंके चूडामणि हैं ॥५॥ रामके नेत्र नील कमलके समान हैं, भृकुटीपर काजलकी बिन्दी शोभायमान है । मानो मुखचन्द्रके छविरूप अमृतकी चौकसीके लिये शृङ्गाररसने रक्षक नियुक्त किया हो । रामलला शोभाके समुद्र हैं ॥६॥ उनकी गभुआरी अलकावली सुशोभित है तथा मनोहर ललाट-प्रदेशपर लटकन लटक रहा है । मानो नक्षत्रगण अन्धकारको विदीर्ण करके मार्ग निकालकर चन्द्रमासे मिलनेको चले हों । रामलला स्वभावसे ही शोभायमान हैं ॥७॥ वे खिलौनोंको देखकर किलकारी मारते हैं और उनके चरण, हाथ और नेत्र चञ्चल हो जाते हैं; मानो सौन्दर्यके सरोवरमें कमल, चित्र-विचित्र पक्षी और भ्रमरगण किकोल कर रहे हों । रामलला भक्तोंके लिये कल्पवृक्षरूप हैं ॥८॥ बालक रामके अर्थहीन शब्द सुने जानेपर चारों फल प्रदान करते हैं । मानो इन शब्दोंसे सहमकर ही वृक्ष और त्रिपुरहर शङ्कर तपस्वी हो गये हैं । रामलला- का नाम ही साक्षात् कामधेनु है ॥ ९॥ सखियाँ तथा सुमित्रा महारानी मणि, भूषण और वस्त्रोंका विभागकर निछावर करती हैं । वे झुलातीऔरपुचकारतीहुई प्रेमसे उमँग-उमँगकर मधुर स्वरसे गाती हैं। रामलला जगन्मङ्गल रूप हैं ॥ १० ॥ जैसे सीपसे मोती प्रकट होता है और अदितिसे सूर्यका जन्म हुआ है, उसी प्रकार कौसल्याने गुण, मङ्गल और रूपके निधान रघुनन्दनको जन्म दिया है । रामलला त्रिभुवनको विभूषित करनेवाले हैं ॥ ११ ॥ जबसे रामका प्रादुर्भाव हुआ है, तबसे सारे अमङ्गलोंकी जड़ कट गयी है, मित्र- मण्डल आनन्दित है, हितैषियोंका अभ्युदय हो रहा है तथा वैरियोंके हृदयमें शूल होता है । रामलला संसारके भयको भङ्ग करनेवाले