भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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गीतावली ४४ भरत सुमित्रा लये, कैकयी सत्रुसमन, तन प्रेम-पुलक मगन मन भये हैं ॥ १ ॥ मेढ़ी लटकन मनि-कनक-रचित, बाल- भूषन बनाइ आछे अंग अंग ठये हैं। चाहि चुचुकारि चूमि लालत लावत उर तैसे फल पावत जैसे सुबीज बये हैं ॥ २ ॥ घन-ओट बिबुध बिलोकि बरषत फूल अनुकूल बचन कहत नेह नये हैं। ऐसे पितु, मातु, पूत, त्रिय, परिजन बिधि जानियत आयु भरि येई निरमये हैं ॥ ३ ॥ 'अजर अमर होहु', 'करौ हरिहर छोहु' जरठ जठेरिन्ह आसिरबाद दये हैं। तुलसी सराहँ भाग तिन्हके, जिन्हके हिये डिंभ-रामरूप-अनुराग रंग रये हैं ॥ ४ ॥ बालक रामको गोदमें लेकर महाराज दशरथ बड़े आनन्दमें भरे हुए हैं, कौसल्या महारानीने भी ललककर लखनलालको ले लिया है तथा सुमित्राने भरतको और कैकेयीने शत्रुघ्नको उठा लिया है। इस समय उनका तन प्रेमसे पुलकित एवं मन आनन्दमग्न हो रहा है ॥ १ ॥ बालोंको गुहकर बनायी हुई चोटीमें मणि और सुवर्णके लटकन लटक रहे हैं और बालकोंके उपयुक्त अच्छे-अच्छे आभूषण बनाकर अङ्ग-अङ्गमें सजाये गये हैं। माता-पिता प्रेमपूर्वक देखकर और चुचकार-चुचकारकर तथा बालकोंको चूमकर लाड़ करते और हृदयसे लगा लेते हैं। उन्होंने जैसे सुन्दर बीज बोये हैं, वैसे ही फल पा रहे हैं॥ २ ॥ देवतालोग बादलोंकी ओटमेंसे यह कौतुक देखकर