भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 98

गीतावली ६२ [ ४८ ] आजु सफल सुकृत फलु पाइहौं । सुखकी सींव, अवधि आनँदकी अवध बिलोकि हौं पाइहौं ॥ १ ॥ सुतनि सहित दसरथहि देखिहौं, प्रेम पुलकि उर लाइहौं । रामचंद्र-मुखचंद्र-सुधा-छबि नयनचकोरनि प्याइहौं ॥ २ ॥ सादर समाचार नृप बुझिहैं, हौं सब कथा सुनाइहौं । तुलसी ह्वै कृतकृत्य आश्रमहिं राम लखन लै आइहौं ॥ ३ ॥ आज मैं सम्पूर्ण शुभ कर्मोंका फल पा लूंगा, क्योंकि सुखकी सीमा तथा आनन्दकी अवधि अवधपुरीको देख पाऊँगा ॥ १ ॥ मैं पुत्रोंके सहित दशरथजीको देखूंगा और प्रेमसे पुलकित हो उन्हें हृदयसे लगाऊँगा तथा रामचन्द्रजीके मुखचन्द्रकी छविरूप सुधाका अपने नेत्ररूप चकोरोंको पान कराऊँगा ॥ २ ॥ महाराज आदरपूर्वक मुझसे सारे समाचार पूछेंगे और मैं उन्हें सारी कथा सुनाऊँगा । तुलसीदास कहते हैं फिर मैं कृतकृत्य होकर राम और लक्ष्मणको अपने आश्रमपर ले आऊँगा ॥ ३ ॥ राग नट [ ४९ ] देखि मुनि ! रावरे पद आज । भयो प्रथम गनतीमें अबतें हौं जहाँ लौं साधु समाज ॥ १ ॥ चरन बंदि, कर जोरि निहोरत, “कहिय कृपा करि काज । मेरे कछु न अदेय राम बिनु, देह-गेह सब राज” ॥ २ ॥ भली कही भूपति त्रिभुवनमें को सुकृती-सिरताज ? तुलसि राम-जनमहितें जनियत सकल सुकृतको साज ॥ ३ ॥