गोभिल गृह्यसूत्रम् (सामवेद कौथुम-राणायनीय शाखा - मुकुन्द शर्मा सटीक)

गोभिल गृह्यसूत्रम् (सामवेद कौथुम-राणायनीय शाखा - मुकुन्द शर्मा सटीक)
Gobhila Grihyasutram of Samaveda with Commentary
महर्षि गोभिल (टीकाकार: पण्डित मुकुन्द शर्मा) द्वारा
DevanagariHindipublished332 पृष्ठ
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२५४ समावर्त्तनविधिः। [ ३ प्रपाठके- उपोत्थायाऽऽदित्यमुपतिष्ठेतो-“द्यन्भ्राजभृष्टिभिर्”-त्येतत्प्र- भृतिना मन्त्रेण ॥ ३० ॥ ( मं० ब्रा० १।७।६-९ ) उप-आचार्यसमीपात्। मन्त्रेण-उद्यन्नित्यादि-मा मा हिंसीरित्यन्तेन ४ मन्त्रकदम्बेन। वक्ष्यमाण (३२) सूत्रस्वरसात्। उपतिष्ठेत-तदभिमुखः सन्नारा- धयेत्। अत्र देवपूजायामुपान्तिष्ठते- ( पा० १।३।२५ वा० ) इत्यात्मनेपदं बोध्यम् मन्त्रां ( मन्त्रकदम्बो ) यथा- “उद्यन्भ्राजभृष्टिभिरिन्द्रोमरुद्भिरस्थात्प्रातर्यावभिरस्थात्। दशसनिरसि नशसनिम्माकुर्वात्वाविशाम्यामाविश ॥ ६ ॥ उद्यन्भ्राजभृष्टिभिरिन्द्रोमरुद्भिरस्थात्सान्तपनेभिरह्यात् ! शतसन