भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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७२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३६ [ तारागणों के परस्पर आकर्षण रखने, अपने अपने मार्ग पर चलने उछलने डूबने आदि की विद्या ], ऋतुओं ५, [ वसन्त आदि ऋतुओं के क्रम और कारण आदि की विद्या ], आर्त्तवों ६, [ ऋतुओं में उत्पन्न पदार्थों, फूल फल आदि की उत्पत्ति और उपकार की विद्या ], और संवत्सरों ७, [ वर्ष में ऋतु महीने आदि कैसे बसते हैं और सब मनुष्य आदि प्राणी कैसे उसका उपभोग करते हैं, इसकी विद्या ] - इन सबको इस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पुष्ट करता है, [ क्योंकि ] जल अमृत है। ( पुरुषः ब्रह्म, अथ आप्रियनिंगमः भवति ) पुरुष ब्रह्म है और यह सब प्रकार प्रिय निगम [ वैदिक सिद्धान्त ] है, ( तस्मात् वै विद्वान् पुरुषम् इदम् पुण्डरीकम् इति ) [ आचष्टे ] इस- लिए ही विद्वान् मनुष्य पुरुष को ऐश्वर्यवान् शुद्धस्वरूप ब्रह्म [ कहता है ] ( एषः सः प्राणः पुरि शेते सः पुरि शेते इति ) यही प्राण शरीर में रहता है, यही शरीर में रहता है। (पुरिशयं सन्तं प्राणं पुरुषः इति आचक्षते ) शरीर में वर्त्तमान रहते हुये प्राण [ जीवन साधन ] को पुरुष [ आत्मा वा परमात्मा ] कहते हैं। (परोक्षेण) परोक्ष [ आँख ओट प्रलय में वर्त्तमान ब्रह्म ] के द्वारा (परोक्षप्रियाः इव हि ) परोक्षप्रिय [ आँख ओट भविष्य के प्रेमी ] लोगों के समान ही ( देवाः ) देवता [ विद्वान् लोग ] ( प्रत्यक्षद्विषः) प्रत्यक्ष [ वर्त्तमान अवस्था ] के द्वेषी (भवन्ति) होते हैं [ देखो कण्डिका १ तथा ७ ]। [वही प्रकरण दूसरे प्रकार कहा जाता है] (सः यत् पूर्वम् आचामति पुरस्ताद्धो- मान् तेन अस्मिन् अवरुन्धे ) वह जो पहिला आचमन करता है पुरस्तात् होमों [ पहिले होम विशेषों के फलों ] को उस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पाता है। (सः यत् द्वितीयम् आचामति आज्यभागौ तेन अस्मिन् अवरुन्धे ) वह जो दूसरा आचमन करता है दो आज्य भागों [ अग्नि के उत्तर और दक्षिण भाग में घी की दो आहुति विशेष के फल ] को उस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पाता है। ( सः यत् तृतीयम् आचा- मति संस्थितहोमान् तेन अस्मिन् अवरुन्धे ) वह जो तीसरा आचमन करता है संस्थितहोमों [ अन्तिम होम विशेषों के फल ] को उस [ विधि ] से इस [ शरीर ] में पाता है। ( सः यत् द्विः परिशुम्भति तत् समित्संबर्हिः ) वह जो दो बार सजाता है वह समिधा [ काष्ठ ] और विधिपूर्वक अग्नि है, ( सः यत् सर्वाणि खानि सर्वं देहम् तारागणानां परस्पराकर्षणविज्ञानम् (ऋतून् ) वसन्तादीनां क्रमकारणादिबोधम् । ( आर्त्तवान् ) ऋतु-अण् । ऋतुभवानां पुष्पफलादिपदार्थानां ज्ञानम् (संवत्सरान् ) संपूर्वाच्चित् ( उ० ३ । ७२ ) सम् + वस निवासे-सरन् । संवसन्ति वसन्तादयो यत्र । कालोपभोगविद्याः ( पुरुषः ) पुरः कुषन् ( उ० ४ । ७४ ) पुर अग्रगमने - कुषन् । पुरुषः पुरिखादः पुरिशयः पूरयतेर्वा पूरयन्त्यन्तरित्यन्तरपुरुषमभिप्रेत्य - निरु० २ । ३ । अग्रगामी परमात्मा ( इदम् ) इन्देः कमिञ्लोपश्च ( उ० ४ । १५७) इदि परमैश्वर्ये-कमिन्, नलोपः । परमैश्वर्ययुक्तम् (पुण्डरीकम् ) फर्फरीकादयश्च ( उ० ४ । २० ) पुण शुद्धौ धर्मकृत्यकरणे च-ईकन्, पृषोदरादित्वात् साधुः । शुद्धस्वरूपं ब्रह्म । (पुरिशयम्) पुरि + शीङ् स्वप्ने - अच् । पुरि शरीरे वर्त्तमानम् (पुरस्ताद्धोमान्) होमविशेषान्, तेषां फलम् ( अवरुन्धे ) प्राप्नोति ( आज्यभागौ ) अग्नेरुत्तर- दक्षिणभागयोर्घाहुतिद्वयम् (संस्थितहोमान् ) यज्ञविशेषान् (समित्संबर्हिः)