भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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६२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० ८ ।। [ इन्द्रिय गणों के बीच ] ब्रह्मचारी एक पग से खड़ा रहा, दूसरे सहस्र वर्ष [ नाड़ियों में ] मस्तक पर ही अमृत [ जल ] की धारा को धारण किया ( ब्राह्माणि अष्टाचत्वारिंशतं वर्षसहस्राणि सलिलस्य पृष्ठे--शिवः अभ्यतपत् ) ब्रह्मा के अड़तालीस सहस्र वर्ष [ सलिलस्य पृष्ठे-अथ० ११ । ५ । २६ ] जल के ऊपर [ विद्या रूप जल में स्नान करने के लिये ] शिव [ मंगलदायक ब्रह्मचारी ] ने सब ओर से तप किया, ( तस्मात् तप्तात् तपसः भूयः एव अभ्यतपत् ) उस तप किये हुये तप से अधिक भी उसने तप किया । ( तत् अपि एताः ऋचः अभिवदन्ति-प्राणापानौ जनयन्--इति ब्राह्मणम् ) वह भी यह ऋचायें बतलाती हैं [ अथ० ११ । ५ । २४ पाद ३, ४, मन्त्र २५, २६ ] प्राण और अपान [ बलवर्धक श्वास और दोषनाशक प्रश्वास ] को प्रकट करता हुआ···यह मन्त्र है, यह ब्राह्मण है ॥ ८ ॥ भावार्थः-यह कण्डिका [ प्राणापानौ जनयन्...... ] इन अढ़ाई मन्त्रों से आरम्भ होकर इन ही मन्त्रों पर समाप्त होती है, इससे इस कण्डिका का इन मन्त्रों से दृढ़ सम्बन्ध है, वे मन्त्र यह हैं । प्राणापानौ जनयन्नाद् व्यानं वाचं मनो हृदयं ब्रह्म मे धाम् ॥ २४ ॥ चक्षुः श्रोत्रं यशो अस्मासु धेह्यन्नं रेतो लोहितमुदरम् ॥ २५ ॥ तानि कल्पद् ब्रह्म- चारी सलिलस्य पृष्ठे तपोऽतिष्ठत् तप्यमानः समुद्रे । स स्नातो बभ्रुः पिङ्गलः पृथिव्यां बहु रोचते ॥ २६ ॥ अथ० ११ । ५ । २४, म० २५, २६ ॥ वह [ ब्रह्मचारी ] ( प्राणापानौ ) प्राण और अपान [ श्वास प्रश्वास विद्या ] को (आत्) और ( व्यानम् ) व्यान [ सर्वशरीर व्यापक वायु विद्या ] को ( वाचम् ) वाणी [भाषण विद्या] को, (मनः) मन [मनन विद्या] को, ( हृदयम्) हृदय [ के ज्ञान ] को, (ब्रह्म ) ब्रह्म [ परमेश्वर ज्ञान] को और ( मेधाम् ) धारणावती बुद्धि को ( जनयन् ) प्रकट करता हुआ [ वर्तमान होता है ] ॥ २४ पाद ३, ४ ॥ [ हे ब्रह्मचारी ! ] ( अस्मासु ) हम लोगों में ( चक्षुः ) नेत्र, (श्रोत्रम् कान (यशः) यश, ( अन्नम् ) अन्न, (रेतः) वीर्य, ( लोहितम् ) रुधिर और (उदरम् ) उदर [ की स्वस्थता ] (धेहि ) धारण कर ॥२५॥ (ब्रह्मचारी ) ब्रह्मचारी ( तानि ) उन [ कर्मों ] को ( कल्पत् ) करता हुआ ( समुद्रे ) समुद्र [ के समान गम्भीर ब्रह्मचर्य ] में ( तपः तप्यमानः ) तप तपता हुआ [ वीर्य निग्रह आदि तप करता हुआ ] ( सलिलस्य पृष्ठे ) जल के ऊपर [ विद्या रूप जल में स्नान करने के लिये ] ( अतिष्ठत् ) स्थित हुआ है । ( सः ) वह ( स्नातः ) स्नान किये हुये [ स्नातक- ब्रह्मचारी] (बभ्रुः) पोषण करने वाला और (पिङ्गलः) बलवान् होकर ( पृथिव्याम् ) पृथिवी पर (बहु ) बहुत ( रोचते ) प्रकाशमान होता है ॥ २६ ॥ ऐसे बहुत से मन्त्र हैं जैसे ( जीवेम शरदः शतम् ॥ भूयसीः शरदः शतात् ॥ अथ० १९ । ६७ । २,८ ) अर्थ-सौ वर्षों तक हम जीते रहें ।। और सौ से भी अधिक ( उ० ३ । ६२ ) वृञ् वरणे--सप्रत्ययः । संवत्सरः । द्वीप यथा भारतवर्षम्, हरिवर्षम् । नाडीसमूहः (ब्राह्माणि ) ब्रह्मन्-अण् । ब्रह्मसम्बन्धीनि ॥