गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६ ) सन् १८६१ में प्रकाशित श्री पं० जीवानन्द विद्यासागर, कलकत्ता द्वारा सम्पादित मूल गोपथ की प्रति ये दो ही संस्करण उपलब्ध थे । श्री मित्र जी के पास गोपथ मूल की हस्त- लिखित प्रतियों का प्रायः अभाव होने से इस सर्वप्रथम प्रकाशित संस्करण में अशुद्धियों की भरमार है। थोड़ा भी अर्थ के विचार करने पर जिन पाठों को शुद्ध या सम्भावित कह कर टिप्पणी में दिखाया जा सकता था, वह भी नहीं किया गया । बीच-बीच में कई- कई पंक्तियाँ त्रुटित एवं च्युत हैं¹। इस विषय में श्री जीवानन्द जी विद्यासागर ने भी मित्र संस्करण का ही प्रायः अनुकरण किया है । पाठ भ्रष्टता की दृष्टि से दोनों ही संस्क- रण प्रायः एक जैसे हैं । यतः भाष्यकार अपने भाष्य से पाँच वर्ष पूर्व १६१६ में E. J BRILL, LEI- DEN में छपे Dr. DIEUKE GAASTRA द्वारा सम्पादित संस्करण से पूर्णतया अपरिचित हैं अतः पाठ के संशोधन में यह ( जर्मन सस्करण ) गोपथ का मूल संस्करण जो अतीव उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है उससे त्रिवेदी जी लाभ नहीं उठा सके हैं । निःसन्देह यह संस्करण यदि उन तक उस समय पहुँच पाता तो गोपथ मूल एवं भाष्य दोनों में ही अत्यन्त यथेष्ट परिवर्तन हो सकते थे । इस संस्करण में पूर्व दोनों संस्करणों की अपेक्षा पर्याप्त परिश्रम किया गया है, यद्यपि कुछ भ्रष्टपाठ एवं त्रुटित पाठ इस संस्करण में भी हैं पर वे इन दोनों संस्करणों की अपेक्षा से नगण्य ही हैं । दुर्भाग्य की बात तो यह है कि इतने भ्रष्ट मित्र संस्करण की सन् १६७२ में पुनः इन्डोलॉजिकल बुक हाउस द्वारा फोटो कॉपी करा ली गई है, जिससे अशुद्धियाँ तद्वत् रह गईं । अब तो जर्मन संस्करण को देखकर शुद्ध करके छपवाना चाहिये था । वैदिक ग्रन्थों के प्रति भारतीयों की यह उपेक्षा, उदासी- नता, परिश्रम न्यून तथा धनोपार्जन एवं यश अधिक अर्जित करने की प्रवृत्ति बड़ी ही चिन्तावह है । व्यापारिक दृष्टिकोण के समक्ष आर्ष ग्रन्थों के संरक्षण का प्रश्न समाप्त- प्राय सा हो रहा है । भाष्यकार ने यद्यपि ऐतरेय ब्राह्मणादि से कण्डिकाओं का मिलान करके कुछ भ्रष्टपाठों को शुद्ध करने का प्रयास किया है परन्तु अधिकांश भ्रष्ट पाठों को आर्षशैली, आर्ष प्रयोग कहकर पूर्ववत् पाठ रहने दिया है। स्पष्ट लेखक प्रमाद द्वारा हुई त्रुटियों को भी “आर्षो ह्रस्वत्वम्” “आर्षो दीर्घः” इत्यादि कहकर वह उसे साधु सिद्ध कर देते हैं । ऐसे शब्दों की भाष्यगत शब्द सिद्धियों में भरमार है। प्रस्तुत संस्करण में जर्मन संस्करण के आधार पर ऐसे शब्दों का संशोधन करके प्रायः उनकी आर्ष-प्रयोगः भाषा को निकाल कर शब्द सिद्धियाँ ठीक कर दी गई हैं । यथासंभव ऐसे स्थलों में टिप्पणियाँ देकर पूर्व संस्करण के भ्रष्टपाठ को भी दिखा दिया गया है । यहाँ कुछ शब्दों के नमूने जिन्हें भाष्यकार द्वारा आर्ष-प्रयोगः कहा गया था, दिखाये जा रहे हैं— आर्ष-प्रयोगः कहे हुये पाठ शुद्ध परिवर्त्तित पाठ विन्वन्ति ( आर्षरूपम् ) गो. पू. २ । १६ विदन्ति विद्धूते ( ऊकारः आर्षः ) ,, ,, १ । २७ विद्यते १. गो. उ. २ । १३ प्रस्तुत संस्करण का पृष्ठ ३३५ पंक्ति २० यहाँ पूरी पंक्ति त्रुटित है ।