भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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( ८ ) ( ख ) 'यज्ञे अकुशला ऋत्विजो भवन्त्यचरितिनो ब्रह्मचर्यमपराग्या वा तद्वै यज्ञस्य विरिष्टम् इत्याचक्षते' ( गो० पू० १।१३ ) यहाँ यज्ञ के सम्बन्ध में कहा कि यदि यज्ञ में ऋत्विज् अकुशल, ब्रह्मचर्य धारण न करने वाले, वैराग्य रहित होते हैं तो यज्ञ का नाश हो जाता है। इसके आगे भी इस कण्डिका का सम्पूर्ण भाग अत्यन्त ही द्रष्टव्य है जिसमें बड़ी मनोरञ्जकता से यह स्पष्ट किया है कि ऋत्विजों के अकुशल अयोग्य होने पर किस प्रकार क्रमशः ऋत्विज्, यजमान, ऋत्विजों की दक्षिणायें यजमान के पुत्र-पशु एवं योग-क्षेम सब कुछ नष्ट हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि यज्ञ में श्रेष्ठ सदाचारी ऋत्विज् अवश्य होने चाहियें। ( ग ) 'यथा आमपात्रम् उदक आसिक्ते निर्मृज्येत् एवं यजमानाः निर्मृज्येरन्' (गो० पू० ४।१३ ) । यहाँ भी संवत्सर एवं महाव्रत का वर्णन करते हुये ऋत्विजों की पात्रता के सम्बन्ध में कहा है कि ऋत्विज् तेजस्वी, सत्यवादी संशितव्रत होने चाहियें, जो ऐसे नहीं होते उनके द्वारा कराया हुआ यज्ञ ऐसे ही नष्ट हो जाता है जैसे कच्चे मिट्टी के घड़े में भरा हुआ जल घड़े के टूट जाने के कारण बह जाता है, यजमान का यज्ञ भी इसी प्रकार बह जाता है नष्ट हो जाता है। ( घ ) 'कुम्भे लोष्टः प्रक्षिप्तो नैव शौचार्थाय कल्पते, नैव शस्यं निर्वर्त्तयति' ( गो० पू० २।२३ ) अर्थात् घड़े में मिट्टी के ढेले के डालने पर उसका उपयोग न तो सफाई के लिये हो पाता है, न ही उससे धान्य सम्पत्ति हो पाती है इसका तात्पर्य यही कि उपयोगी वस्तु का भी यदि अस्थान में प्रक्षेप कर दिया जाय तो उसकी उपयोगिता नष्ट हो जाती है। ( ङ ) 'एनं पूर्वे वयसि पुत्राः पितरमुपजीवन्ति उपोत्तमे वयसि पुत्रान् पितो- पजीवति य एवं वेद स वा एष संवत्सरः' ( गो० पू० ४।१७ ) । यहाँ यह बताया है कि पहली अवस्था में पिता के सहारे पुत्र जीता है किन्तु पिछली अवस्था = बुढ़ापे में पिता पुत्रों के सहारे जीता है जो यह समझता है वही संवत्सर यज्ञ का वेत्ता है। वस्तुतः बुढ़ापे में माता-पिता की सेवा ही वास्तविक श्राद्ध एवं तर्पण है इस विषय में यहाँ बड़ा हृदयग्राही प्रकाश डाला गया है। ( च ) 'परिमितं भूतम् अपरिमितं भव्यम्' ( गो० उ० ५।३ ) अर्थात् भूत सीमित है परन्तु भविष्य असीम है इसलिये किसी बुरे कार्य के कर लेने पर केवल सदैव दुःख ही करते रहने की आवश्यकता नहीं है अपितु वर्त्तमान को सुधार कर भविष्य बनाने की चेष्टा करनी चाहिये, क्योंकि भविष्य असीम है। निराशा में डूबे हुये व्यक्ति के लिये ये वाक्य आशा-सञ्चाररूपी औषध है। गोपथ की मूल पाठगत अशुद्धियाँ—प्रस्तुत गोपथ ब्राह्मण के भाष्यकार श्री पं० क्षेमकरणदास जी त्रिवेदी के समक्ष भाष्य करते समय एशियाटिक सोसाइटी कलकत्ता से सन् १८७२ में प्रकाशित श्री पं० राजेन्द्रलाल मित्र सम्पादित गोपथ मूल की प्रति एवं