भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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( ७ ) तथा घूमती है। सूर्य कभी छिपता नहीं, अपितु घूमती हुई पृथिवी के ओट में पड़ जाता है¹ । गोपथ में आये कुछ शब्दों की व्युत्पत्तियां—निरुक्त के अनुसार गोपथ ब्राह्मणकार भी “अर्थनित्यः परीक्षेत” (निरु० २ । १) के पूर्ण समर्थक हैं। निरुक्तकार ने जिस प्रकार निर्वचन के सम्बन्ध में “अविद्यमाने सामान्‍येऽप्यक्षरवर्णसामान्यान्निब्रूयात्” का सिद्धान्त स्थिर किया है, उसका पूर्ण अनुसरण ग्रन्थकार करते हैं।² प्रस्तुत ग्रन्थ में आयी कुछ मार्मिक शब्द व्युत्पत्तियाँ यहाँ प्रस्तुत की जा रही हैं— ( क ) सुवेदं सन्तं स्वेद इत्याचक्षते (गो० पू० १ । १) यहाँ एक कथा के आधार पर बताया गया है कि सुवेद अर्थात् वेद के अच्छे जानकार होने से ही पसीने को स्वेद कहा जाता है। वेदाभ्यास करने पर पसीना निकला वह पसीना ही उसके वेदाध्ययन का परिचायक या प्रतीक था अतः वह पसीना ही 'सुवेद' होने से अन्ततः वह स्वेद बन गया। ( ख ) तं वा एतं रसं सन्तं रथ इत्याचक्षते (गो० पू० २ । २१) यहाँ रसपूर्ण अर्थात् आनन्द पूर्ण होने से ही इसकी रथ संज्ञा बताई गई है। ( ग ) श्रेष्ठां धियं क्षियतीति दीक्षितः (गो पू० ३ । १६) अर्थात् श्रेष्ठ बुद्धि का ज्ञापक होने से दीक्षित संज्ञा है। यहाँ “धीक्षितं” ही दीक्षित है। ( घ ) छिद्रं खमित्युक्तं तस्य मेति प्रतिषेधः, मां यज्ञं छिद्रं करिष्यतीति (गो. उ. २ । ५) ॥ यह यज्ञार्थक 'मख' शब्द की अतीव उपयोगी तथा सुन्दर व्युत्पत्ति है, इसमें बताया है कि 'ख' का अर्थ छिद्र है; इसका 'मा' शब्द द्वारा प्रतिषेध किया है, अर्थात् ऐसा कृत्य जो कि सभी छिद्रों या अशुद्धियों से विरहित हो। इससे स्पष्ट है कि यज्ञ में कोई अशुद्धि या भूल न होनी चाहिये। ( ङ ) अथर्ववेद के प्रसिद्ध कुन्ताप सूक्त के कुन्ताप शब्द की बड़ी सुन्दर व्युत्पत्ति प्रस्तुत है—'कुयं वै नाम कुत्सितं तद्यत्तपति, तस्मात् कुन्तापः' (गो. उ. ६ । १२) स्पष्टतः यह अन्वर्थ व्युत्पत्ति है। ( च ) गो. उ. ३ । २० में साम शब्द की सुन्दर व्युत्पत्ति की गई है। इसमें सा + अम यह पदच्छेद बताया गया है। वस्तुतः यह व्युत्पत्ति इससे पूर्व की बृहदारण्यको- पनिषद् ६ । ४ । २० से तुलनीय है। गोपथ ब्राह्मण के सुभाषित—प्रस्तुत ब्राह्मण में कुछ बड़े ही मार्मिक सुन्दर सटीक सुभाषितों का प्रयोग किया गया है। जिसके कुछ उदाहरण पाठकों के रसास्वादनार्थ प्रस्तुत हैं— ( क ) “परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः” ( गो. पू. १ । १ ) । अर्थात् देवता ज्ञानी पुरुष परोक्ष से प्रेम करते हैं तथा प्रत्यक्ष से द्वेष करने वाले होते हैं। यह उस अचिन्त्य शक्ति के सन्दर्भ में कहा गया है कि वह ईश्वर परोक्ष होकर भी प्रिय है तथा अन्य दृश्यमान भौतिक पदार्थ प्रत्यक्ष होकर भी द्वेष-योग्य हैं। १. द्र. गो. उ. ४ । १०॥ २. द्र. “रूपसामान्यादर्थसामान्याद्” ॥ गो. पू. १ । २६ ।