भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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( ६ ) समय के गिरे हुये काल के अनुसार इतिहास पर आधारित विवरण ही होना चाहिये। इस प्रकार के विवरणों से वैदिक सिद्धान्त दूषित नहीं होता। ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर धर्म की गति का निर्धारण नहीं होता है क्योंकि इतिहास का कार्य तो अतीत में घटित तथ्यों का संकलन मात्र है उसमें तो अच्छे बुरे सभी वृत्तान्त होंगे, उन सभी को धर्म में कैसे गिना जा सकता है ? अतः ऐसे तथ्यों को धार्मिक तथ्यों के रूप में लेना ही नहीं चाहिये। गोपथ ब्राह्मण तथा ज्योतिष—गोपथ ब्राह्मण में यथावसर ज्योतिष एवं खगोल विद्या की भी बातें आई हैं जिनसे कई वैदिक तथ्यों का महत्त्वपूर्ण उद्घाटन होता है। ऋतु, संवत्सर तथा मासों का वर्णन इस ग्रन्थ में मिलता है¹। यहाँ ३, ६ अथवा ७ ऋतुयें भी मानी गई हैं। स्पष्टतः यह उस समय के प्रचलित विभिन्न मत हैं। इसी प्रसङ्ग में १२ मासों की चर्चा भी हुई है। यद्यपि उनके नामों का विवरण इसमें नहीं है। बिना कोई नाम लिये १३ वें ²अधिमास का भी वर्णन हुआ है अर्थात् १२ अथवा १३ मास के वर्ष का उल्लेख है। ज्योतिष से सम्बन्धित एक प्रसङ्ग यहाँ अत्यन्त उद्धरणीय है—एक स्थान पर 'फल्गुनी पौर्णमासी' का नाम लिया गया है इससे ज्ञात होता है कि चित्रा, विशाखादि नक्षत्रों के नाम से पूर्णमासी तथा मासों के नाम रखने की परम्परा तब प्रारम्भ हो चली थी।³ इसी वाक्य का पूरा उद्धरण यह कहता है—कि फल्गुनी पौर्णमासी ही संवत्सर का मुख है।⁴ यह उद्धरण ज्योतिर्विदों के लिये अतीव ध्यातव्य है। आज तो वर्ष का प्रारम्भ फाल्गुन पूर्णमासी के अनन्तर होता है। यह उचित नहीं जँचता। जब से नये मास का प्रारम्भ हुआ है तब से ही नये वर्ष का प्रारम्भ मानना चाहिये। चैत्र का प्रारम्भ १५ दिन बाद तथा वर्ष का प्रारम्भ १५ दिन पूर्व होने में कोई औचित्य या सामञ्जस्य नहीं लगता पर गोपथ ब्राह्मण के इस महनीय वाक्य से यह संकेत मिलता है कि वर्ष का प्रारम्भ भी चैत्र मास के प्रारम्भ के साथ ही अर्थात् फल्गुनी पौर्णमासी के ठीक अनन्तर माना जाता था। यहाँ ज्योतिष की दृष्टि से तर्क संगत भी है। बाद के समय में १५ दिन की यह भूल कब से प्रारम्भ हुई, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। इस ग्रन्थ में एक स्थान पर उत्तरायण तथा दक्षिणायन का भी वर्णन है जो कि अन्य प्राचीन ग्रन्थों से तुलनीय है⁵। इसमें ही एक यह भी उद्धरण है कि पृथ्वी गोल है १. द्रष्टव्य गो. पू. ५ । ५॥ २. यजुर्वेद २२ । ३१ में अधिमास = मलमास की अंहसस्पति संज्ञा है। ऋग्वेद १ । २५ । ८ में १२ मास एवं १३ वें लांद मास का स्पष्ट उल्लेख है ॥ ३. वेद में १२ मासों के नाम इस प्रकार आये हैं—"मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभ, नभस्य, इष, ऊर्ज, सह, सहस्य, तप, तपस्य" ( यजु० २२ । ३१ ) इन दो-दो मासों के जोड़े वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर इन छः ऋतुओं के द्योतक हैं ॥ ४. "एतद्वै संवत्सरस्य मुखं यत् फल्गुनी पौर्णमासी" • • • 'द्र. गो. उ. १ । १९ ॥ ५. द्र. गो. उ. ६।६ यह तैत्तिरीय संहिता ६ । ५ । ३ से तुलनीय है ॥