गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 11, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५ ) इस वचन के द्वारा चतुष्पात् आत्मा को मानने के कारण ओ३म् को चतुर्मात्र मानना उचित समझा हो, इसी प्रसङ्ग में ओम् की प्रकृति प्रत्ययादि के विषय में ३६ प्रश्न किये गये हैं तथा उनके उत्तर भी दिये गये हैं, जो बहुत ही रोचक हैं । इस प्रकरण में ओंकार के सम्बन्ध में दो आलङ्कारिक मनोरञ्जक आख्यायिकायें उद्धृत करते हुये यह भी सिद्ध किया गया है कि उच्चारण करते समय प्रत्येक मन्त्र से पूर्व ओ३म् को बोलना चाहिये १ । द्वितीय प्रपाठक के प्रारम्भ में ही ब्रह्मचारी का महत्त्व तथा उसके कर्त्तव्यों का विवेचन बहुत ही उत्तमता से हुआ है । इन वर्णनों के मध्य में अथर्ववेद के प्रसिद्ध ब्रह्मचर्य- सूक्त की ऋचाओं को पुष्ट्यर्थ उद्धृत किया गया है । यहाँ वर्णित ब्रह्मचारी के कर्त्तव्यों का वर्णन प्रमुख रूप से तैत्तिरीय उपनिषद् से तुलनीय है । इसी प्रकरण में ब्रह्मचारी को गृहपत्नी द्वारा भिक्षा न दिये जाने पर उस गृहपत्नी का पुण्य-कर्म २ और धनादि का नष्ट होना लिखा है, ३ इस प्रकार ब्रह्मचारी को भिक्षा देना अत्यावश्यक हैं यह बताया गया है ४ । आज के युग में यह बड़ी उत्तम सीख है । ब्रह्मचारी के लिये चारों वेदों का अध्ययन अत्यावश्यक है अतः प्रत्येक वेद के पढ़ने के लिये बारह-बारह वर्ष बांट देने पर ४८ वर्ष का ब्रह्मचर्य आवश्यक है, यह बात भी इस प्रकरण में कही है । इसके आगे अन्त तक यज्ञों का ही वर्णन है । बीच-बीच में यज्ञों के विभिन्न अवयवों का वर्णन करते समय आख्यायिकायें भी दी गई हैं । दर्शपूर्णमास तथा अन्य छोटे यज्ञों के साथ-साथ अग्निष्टोम आदि बड़े-बड़े सोमयागों की भी चर्चा है तथा उस सम्बन्ध में बहुत सी बातें आख्यायिकाओं के माध्यम से बताई गई हैं । ग्रन्थ में कतिपय स्थलों में मांस अभक्षण की भी चर्चा है । इससे पता चलता है कि वैदिक सिद्धान्तानुसार ग्रन्थकार का आशय भी मांस को अभक्ष्य मानने में ही है । जिन किन्हीं वाक्यों से ऐसा भ्रम होता भी है उनका भाष्यकार ने समुचित अर्थ प्रदर्शित कर दिया है या उसे प्रक्षिप्त सिद्ध कर दिया है । एक स्थल पर बहुपत्नीवाद की गन्ध की प्रतीति होने पर भाष्यकार ने स्पष्ट उसे अवैदिक कहकर अपना अभिमत प्रकाशित किया है । हमने वहाँ टिप्पणी देकर यह स्पष्ट किया है कि वहाँ साम और ऋक् की आलंकारिक चर्चा है न कि लौकिक पति-पत्नी की । वस्तुतः किन्हीं ब्राह्मणों में ऐसे स्थलों पर बहुपत्नीत्व की चर्चा भी उपलब्ध हो तो वह उस १. क—“न माम् अनीरयित्वा ब्राह्मणाः ब्रह्म वदेयुः, यदि वदेयुः अब्रह्म तत् स्यादिति” ॥ गो. पू. १ । २३ ॥ ख—“मामिकामेव व्याहृतिमादिनः आदितः कृणुध्वम् इत्येवं मामका आधीयन्ते......तस्मात् ब्रह्मवादिनः ओंकारमादितः कुर्वन्ति” ॥ गो. पू. १ । २८ ॥ २. “तस्मात् ब्रह्मचारिणेऽहरहर्भिक्षां दद्यात गृहिणी मामेयमिष्टापूर्त्तंसुकृतद्रविणमवरुन्ध्यादिति ॥ गो. पू. २ । ६ ॥ ३. द्र. गो. पू. २ । ६ ॥ ४. भिक्षा न देने से गृहपत्नी के पुण्य-कर्मों का इसलिये नाश होता है कि इससे तपस्वी ब्रह्मचारी का अपमान है । मनु महाराज ने तो यह भी कहा है ( मनु० २ । ५० ) कि जो भिक्षा देने से मना करने वाला कन्जूस प्रवृत्ति का हो उससे भिक्षा ब्रह्मचारी माँगे ही नहीं ॥