गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 10, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४ ) पर स्पष्ट रूप से अथर्व को मिलाकर चार वेद बताये हैं। यह अथर्व के पृथक् अस्तित्त्व का प्रतिपादन उसकी अपनी महत्ता का ज्ञापन ही है, इस प्रकार गोपथ ब्राह्मण ने अथर्ववेद के महत्त्व को बढ़ाया है यह कहा जा सकता है। इस ब्राह्मण में अथर्व कां उल्लेख करते समय 'अथर्वाङ्गिरस्' शब्द का प्रयोग बार- बार देखा गया है। इसका कारण यही प्रतीत होता है कि अङ्गिरस् ऋषि में ही अथर्ववेद का प्रकाश हुआ है। गोपथ का काल—यह गोपथ ब्राह्मण अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों की अपेक्षा बहुत अर्वाचीन प्रतीत होता है। इस ग्रन्थ में कहीं भी उदात्तादि स्वरों का प्रयोग नहीं प्राप्त होता, तथा इसकी भाषा में वैदिक शब्दों एवं निपातों का भी उतना प्रयोग नहीं है। ग्रन्थ की भाषा शैली एवं वाक्य-विन्यास भी इस प्रकार का प्रतीत होता है कि इसकी रचना काल तक संस्कृत भाषा की व्यापकता में न्यूनता आ चुकी थी, यह सब इसकी अर्वाचीनता का ही द्योतक है। इस ग्रन्थ में स्थान-स्थान पर अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों के उद्धरण दिये गये हैं, जिन्हें कई स्थान पर “तदप्येतदृचोक्तम् इति ब्राह्मणम्” कहकर प्रस्तुत किया गया है। इनमें सर्वाधिक उद्धरण ऐतरेय ब्राह्मण के हैं जिसे इसी भाष्य में अनुपद मूल संकेत देते हुये दिखा दिया गया है, इस प्रकार यह अन्य ब्राह्मणों की अपेक्षा अर्वाचीन है ऐसा प्रतीत होता है, निश्चित रचना काल बता सकना तो इस ग्रन्थ के ग्रन्थकर्त्ता के ज्ञान के समान ही व्यर्थ प्रयास है। गोपथ ब्राह्मण का विषय—जैसा कि ब्राह्मण ग्रन्थों का मुख्य लक्ष्य यज्ञ निष्पत्ति, याज्ञिक-प्रक्रियाओं द्वारा विज्ञान के रहस्यों का उद्घाटन करना है तदनुसार इस ब्राह्मण ग्रन्थ में भी मुख्य प्रतिपाद्य याज्ञिक प्रक्रिया ही है। अथर्ववेद में आधि-व्याधि नाश एवं भैषज्य-कर्म का बाहुल्य है पर गोपथ में अथर्व के इस प्रमुख विषय को छुआ भी नहीं गया, इसका कारण ब्राह्मण ग्रन्थों की यज्ञ प्रतिपादन परिपाटी ही है। यज्ञ प्रतिपादन में बहुत सी आख्यायिकाओं एवं कण्डिकाओं के भाग तद्वत् अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों एवं श्रौत ग्रन्थों से लिये गये हैं, जिनमें अधिक भाग ऐतरेय ब्राह्मण का है। 'ओ३म्' की विवेचना या अन्य वर्णनों में इस ब्राह्मण ने व्याकरण तथा उपनिषद् से भी कुछ ऋण लिया है। इस प्रकार कुछ सुभाषितादि एवं अथर्व की प्रशंसा-परक आख्यान ही इस ब्राह्मण के अपने अंश कहे जा सकते हैं। ग्रन्थ के पूर्वभाग के प्रारम्भ में ही 'ओ३म्' की महिमा विस्तृत रूप से गाई गई है। ओ३म् के इस वर्णन में माण्डूक्य तथा छान्दोग्य उपनिषद् का बहुत सा अंश वर्त्तमान है। एक विशेषता यह है कि इस ब्राह्मण में ओम् को द्विवर्ण तथा चतुर्मात्र माना है२। एकमात्रिक “अ” तथा द्विमात्रिक “ऊ” = ओ एवं म् ये चार मात्रायें हैं इन चारों मात्राओं से जगत् के विभिन्न पदार्थों की उत्पत्ति बताई गई है, पर माण्डूक्य आदि उपनिषदों में तो इसे तीन ही मात्रा वाला बताया गया है। सम्भवतः माण्डूक्य के 'सोऽयमात्मा चतुष्पा३त्' १. द्र. गो. पू. ५ । ५ ॥ यह अंश श. ब्रा. १२ । ३ । २ । ७ से तुलनीय है। २. द्रष्टव्य गो. पू. १ । १६ ३. माण्डुक्य उपनिषद् १ । २