भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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सम्पादकीय वैदिक वाङ्मय की परम्परा में अथर्ववेद के गोपथ ब्राह्मण का महत्त्वपूर्ण स्थान सर्वसम्मत है । जिस प्रकार कालक्रम से वैदिक ज्ञानधारा विलुप्त विच्छिन्न होती हुई आज भी अपने कुछ अवशेषों द्वारा अपने चिरजीवित होने का तथा देदीप्यमान अतीत का प्रमाण दे रही है, इसी रूप में गोपथ ब्राह्मण की इस समय उपलब्धि समझनी चाहिये । जब कि सहस्रशः दुर्लभ ग्रन्थ अपने नामावशेष के रूप में ही इस समय जीवित हैं तो गोपथ का मूल रूप में उपलब्ध होना सचमुच ही सौभाग्य की बात है, यद्यपि वर्त्तमान में उपलब्ध ऐतरेय शतपथादि ब्राह्मणों की तुलना में यह सर्वाधिक उपेक्षित ब्राह्मण ग्रन्थ है ऐसा निश्चित रूप से उसके बहुसंख्य भ्रष्टपाठों, मूल संस्करणों की न्यूनताओं एवं इसके किसी भी भाष्य की अनुपलब्धि को देखकर कहा जा सकता है । महाभाष्य में १'नवधा अथर्वणः' कहकर अथर्ववेद की नौ शाखायें थीं ऐसा प्रकट किया गया है । इन सभी शाखाओं के अपने- अपने ब्राह्मण रहे होंगे, ऐसी पूर्ण सम्भावना है पर अब तो अथर्व की दो शौनक एवं पैप्पलाद शाखायें ही प्राप्त हैं नौ शाखाओं के नौ ब्राह्मणों की तो बात ही क्या ? इस प्रकार अथर्ववेद जिसे ब्रह्मवेद२ भी कहते हैं, उसका इकलौता जीवित ब्राह्मण होने के कारण इसकी उपादेयता एवं सुरक्षणीयता को कौन अस्वीकार कर सकता है । यह अथर्ववेद का ब्राह्मण है, यह तथ्य इसके वर्णनों से भी प्रकट हो जाता है । इस ग्रन्थ के कई स्थानों पर अथर्व की उपयोगिता तथा महनीयता सिद्ध करने के लिये कई आख्यान दिये गये हैं।३ उनका सार यही है कि जो कार्य्य ऋक्, यजु, साम इन तीनों वेदों से सम्पन्न नहीं हो सका वह अथर्व ने कर दिखाया अतः यह परम उपादेय है, पुनरपि गोपथ ब्राह्मण के अन्तः साक्ष्य के आधार पर यह भी मानना होगा कि जिस शौनक शाखा वाला अथर्व आज उपलब्ध है उस शाखा का यह ब्राह्मण नहीं है । उपलब्ध गोपथ ब्राह्मण पैप्पलाद शाखा का है । पैप्पलाद शाखा का प्रथम मन्त्र 'शन्नो देवीरभिष्टये'''' से प्रारम्भ होता है किन्तु शौनक शाखा में ऐसा नहीं। गोपथ ब्राह्मण में "शन्नो देवीरभिष्टय इत्येवमादि कृत्वा अथर्ववेदमधीयते"४ ऐसा कहा है इससे स्पष्ट पता चलता है कि यह पैप्पलाद शाखा वाले अथर्व का ही ब्राह्मण है। ज्ञानकाण्ड वाला होने के कारण विषय की दृष्टि से अथर्ववेद का अन्तर्भाव प्रायः ऋग्वेद में ही हो जाता है अतः प्राचीन ग्रन्थों में 'त्रयो वेदाः' ऐसा कहने की परिपाटी है । प्रस्तुत ब्राह्मण ग्रन्थ में भी कतिपय स्थलों में तीन वेद बताये हैं५ किन्तु एक६ स्थल १. महाभाष्य १।१।१ पस्पशाह्निक २. यज्ञकार्य के समय ब्रह्मा का ही यह प्रमुख वेद माना गया है अतः ब्रह्मवेद अथर्ववेद की संज्ञा हुई । ३. द्रष्टव्य गो० पू० २। १८-१९ ४. गो. पू. १। २९ ५. स तांस्त्रीन् वेदान् अभ्यश्राम्यत् गो. पू. १।६ ६. गो. पू. १। २९