गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें११४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० १९ ॥ नमस्कारं चकार आंथर्वणाय शंयुं नमः यः मा यज्ञम् अचीक्लृपत् इति ) उस अश्व [ अग्नि ] ने संतुष्ट होकर नमस्कार किया—निश्चल ब्रह्म को जानने वाले शंयु [ शांतिमान मुनि ] को नमस्कार हो, जिसने मुझे यज्ञ के लिये समर्थ बनवाया है। ( अतः अन्ये ब्राह्मणाः ह वै लघुसम्भारातमाः भविष्यन्ति ) इस [ कर्म ] से दूसरे ब्रह्मज्ञानी लोग हलके बोझ वाले होंगे, ( ते आदित्यस्य पदे अनडुहः वत्सस्य अजस्य श्रवणस्य ब्रह्मचारिणः [ पदम् ] वै आ-धास्यन्ति ) वे सूर्य के पद में जीवन पहुँचाने वाले, निवास कराने वाले, प्रेरणा कराने वाले, सुनने वाले ब्रह्मचारी के [ पद को ] स्थापित करेंगे। ( एतत् वै आदित्यस्य पदम् यत् भूमिः तया एव पदे [ पदम् ] आहितं भविष्यति इति ) यही सूर्य का पद है जो भूमि है, उसके साथ ही पद में [ पद ] स्थापित होगा [ अग्नि को भूमि पर हवन कुंड में रक्खे ] । ( अश्वे अग्नौ प्रणीयमाने स ब्रह्मा, अन्वरब्धं यजमानं वाचयति-यत् अक्रन्दः प्रथमं जायमानः इति पंच ) अश्व अर्थात् अग्नि के संस्कार होते हुये पर वह ब्रह्मा अनुष्ठान करते हुये यजमान से बुलवाता है-[ हे अश्व ! ] जो तूने उत्पन्न होते हुये पहिले शुद्ध किया है इन पांच को [ यह प्रतीक ऋग्वेद १ । १६३ । १-५ की है-देखो क० २ । ] ( तं ब्राह्मणाः उपवहन्ति तत् ब्रह्मा उपाकुरुते ) उस [ यजमान ] को ब्राह्मण समीप लाते हैं और तब ब्रह्मा [ उसका ] संस्कार करता है। ( एषः ह वै विद्वान् सर्ववित् ब्रह्मा यत् भृग्वङ्गिरोवित् इति ब्राह्मणम् ) यही विद्वान् सब जानने वाला ब्रह्मा है जो प्रकाशमान ज्ञानों का जानने वाला [ अर्थात् चतुर्वेदी पुरुष ] है, यह ब्राह्मण है ॥ १८ ॥ भावार्थः-यज्ञ में ऋग्वेदी, यजुर्वेदी, और सामवेदी अलग अलग अपना काम करें और चतुर्वेदी आप्त विद्वान् पुरुष ब्रह्मा का आसन ग्रहण करके सब कार्य करावे । देखो गो० पू० ५ । १९, तथा निरुक्त १ । ८ में लिखा है-"ब्रह्मा को जाते जाते विद्यां वदति ब्रह्मा सर्वविद्यः सर्वं वेदितुमर्हति । ब्रह्मा परिवृढः श्रुततः" एक ब्रह्मा उत्पन्न हुये प्रत्येक कर्म में विद्या को बताता है, ब्रह्मा सब विद्याओं वाला होता है, अतः सब कुछ जानने में समर्थ होता है एवं वह वेदज्ञान के कारण से बढ़ा हुआ = समुन्नत होता है ॥ १८ ॥ कण्डिका १९ ॥ देवाश्च ह वा असुराश्चास्पर्द्धन्त ते देवा इन्द्रमब्रुवन्निमं नस्तावद्यज्ञं गोपाय आङ्+शॄ हिंसायां—कर्मणि लङ् । विशीर्णा अभवन् (शंयुम्) शंयवे (अचीक्लृपत् ) कृपू सामर्थ्ये—लुङि चङि रूपम् । समर्थं कारितवान् ( अनडुहः ) सर्वधातुभ्योऽसुन् ( उ० ४ । १८९ ) अनं प्राणने—असुन् । क्विप् च ( पा० ३ । २ । ७६ ) अनस्+वह प्रापने—क्विप्, अनसो डश्च । अनसः प्राणस्य जीवनस्य वा वाहकस्य प्रापकस्य ( वत्सस्य ) वृत्तृवदिवचिवसि० ( उ० ३ । ६२ ) वस निवासे—स प्रत्ययः । निवास- कस्य ( अजस्य ) अज गतिक्षेपणयोः—अच् । प्रेरकस्य ( श्रवणस्य ) श्रवणशीलस्य ( आहितम् ) स्थापितम् ( प्रणीयमाने ) संस्क्रियमाणे ( अन्वारब्धम् ) कृतानुष्ठा- नम् ( उपाकुरुते ) संस्करोति ॥