भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 214

१७६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० २१ ॥ बोला ] सो तुम [ अन्यथा ] दीक्षित होकर धर्म भ्रष्ट हो जाओगे, विद्वानों के चलने योग्य मार्ग कभी प्रकट न होगा, तुम्हारे लिये विद्वानों के चलने योग्य मार्ग गुप्त हो जायगा। ( ते वयं भगवन्तम् एव उपधावाम, यथा स्वस्ति संवत्सरस्य उद्ऋचं समश्नवामहै, इति ब्राह्मणम् ) [ आचार्य बोले ] सो हम आप भगवान् [ श्रीमान् ] के ही पास आवें, जिससे कल्याण के साथ संवत्सर [ यज्ञ ] की समाप्ति वाली ऋचा को हम प्राप्त करें, यह ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञान ] है ॥ २० ॥ भावार्थ:—सब ऋत्विज् लोग दीक्षादि लेकर अपना अपना कर्तव्य कर्म करें जिस- से यज्ञ निर्विघ्न समाप्त होवे ॥ २० ॥ कण्डिका २१ ॥ स होवाच, द्वादश ह वै वसूनि दीक्षितादुत्क्रामन्ति, न ह वै दीक्षितो- ऽग्निहोत्रं जुहुयात्, न पौर्णमासेन यज्ञेन यजेत, नामावास्येनास्मिन्वसीत, न पितृ- यज्ञेन यजेत, न तत्र गच्छेदयत्र मनसा जिगमिषेन्नेष्ट्या यजेत, न वाचा यथाकथा- चिदभिभाषेत, न मिथुनं चरेत् नान्यस्य यथाकाममुपयुञ्जीत, न पशुबन्धेन यज्ञेन यजेत, न तत्र गच्छेदयत्र चक्षुषा पराऽश्येत्, कृष्णाजिनं वसीत, कुरीरन्धारयेन्मु- ष्टीकुर्यादङ्गुष्ठप्रभृतयस्तिस्र उच्च्छ्रयेत्, मृगशृङ्गं गृह्णीयात्तेन कषेताथ यस्य दीक्षितस्य वागवायता स्यान् मुष्टी वा विसृष्टौ स एतानि जपेत् ॥ २१ ॥ कण्डिका २१ ॥ दीक्षित पुरुष के कर्तव्य कर्म और भूल में प्रायश्चित्त ॥ ( सः ह उवाच ) वह [ ब्राह्मण—क० २० ] बोला--( द्वादश ह वै वसूनि दीक्षितात् उत्क्रामन्ति ) बारह उत्तम कर्म [ क० २२ ] दीक्षित [ संकल्प करके नियम धारण करने वाले ] से उन्नति पाते हैं। (दीक्षितः अग्निहोत्रं न ह वै जुहुयात् ) दीक्षित पुरुष अग्निहोत्र को अब अवश्य ही करे १, ( न¹ पौर्णमासेन यज्ञेन यजेत ) अब पौर्णमासी के यज्ञ से होम करे २, .( न अमावास्येन अस्मिन् वसीत ) अब अमावस्या के यज्ञ से इस [ यज्ञश.ला ] में निवास करे ३, ( न पितृयज्ञेन यजेत ) अब पितृयज्ञ से होम करे ४, ( न तत्र गच्छेत् यत्र मनसा जिगमिषेत् ) अब वहां २१-( द्वादश ) द्वादशसंख्यायुक्तानि - क० २२ ( वसूनि ) उत्तमानि कर्माणि ( दीक्षितात् ) संकल्पं विधाय धृतनियमात् ( उत्क्रामन्ति ) उन्नतानि गच्छन्ति ( न ) सम्प्रति--निरु० ७ । ३१ ( वसीत ) वसेत ( जिगमिषेत् ) गन्तु- मिच्छेत् ( इष्ट्या ) । यज्ञविशेषेण । यथा पुत्रेष्ट्या नवशस्येष्ट्या, सवत्सरेष्ट्या १. इस कण्डिका के उपवाक्यों में बहुत बार “न' का प्रयोग हुआ है, जिसका भाष्यकार ने निषेधार्थक अर्थ न करके सर्वत्र विधिमूलक अर्थ किया है, जो कि आश्चर्य- जनक है। वस्तुतः यहाँ कुछ उपवाक्यों में 'न' की निषेधार्थक सङ्गति है, तथा "न वाचा यथाकथञ्चिदभिभाषेत" किन्तु "न पौर्णमासेन यजेत" आदि वाक्यों में विधिमूलक अर्थ ही अभिप्रेत है, सो 'न' का प्रयोग इस प्रकार के वाक्यों में अपपाठ रूप ही प्रतीत होता है ॥ सम्पा० ॥