भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 227

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ४ । क० ८ ।। १८६ भवन्ति, प्रातर्याव्णां देवानां सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब प्रातरनुवाक [ यज्ञ ] को वे स्वीकार करते हैं, तब प्रातःकाल चलने वाले ही देवों देवताओं को पूजते हैं, प्रातःकाल चलने वाले देव देवता होते हैं प्रातःकाल चलने वाले देवों के सहयोग और सहवास को वे पाते हैं जो इसको स्वीकार करते हैं । ८ । ( अथ यत् प्रातः सवनम् उपयन्ति तत् वसून् एव देवान् देवतां यजन्ते, वसवः देवाः देवताः भवन्ति, वसूनां देवानां सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब प्रातःसवन [ प्रातःकालीन यज्ञ ] को स्वीकार करते हैं, तब वसु देवों ही [ आठ वसु—क० ७ ] देवता को पूजते हैं, वसु देव देवता होते हैं, वसु देवताओं के सहयोग और सहवास को वे पाते हैं, जो इसको स्वीकार करते हैं । ६ । ( अथ यत् माध्यन्दिनं सवनम् उपयन्ति, तत् रुद्रान् एव देवान् देवतां यजन्ते. रुद्राः देवाः देवताः भवन्ति रुद्राणां देवानां सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति) फिर जब माध्यन्दिन सवन [ दोपहर के यज्ञ ] को स्वीकार करते हैं, तब रुद्र देवों ही [ ग्यारह रुद्रों—क० ७ ] देवता को पूजते हैं रुद्र देव देवता होते हैं, रुद्र देवों के सहयोग और सहवास को वे पाते हैं, जो इसको स्वीकार करते हैं । १० । ( अथ यत् तृतीयं सवनम् उपयन्ति, तत् आदित्यान् एव देवान् देवतां यजन्ते, आदित्याः देवाः देवताः भवन्ति, आदित्यानां देवानां सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब तृतीय सवन [ तीसरे पहर के यज्ञ ] को स्वीकार करते हैं, तब आदित्य [ बारह महीनों—क० ७ ] देवों देवता को ही पूजते हैं, आदित्य देव देवता हैं, आदित्य देवों के सहयोग और सहवास को वे पाते हैं जो इसको स्वीकार करते हैं । ११ । ( अथ यत् अवभृथम् उपयन्ति, तत् वरुणम् एव देवं देवतां यजन्ते, वरुणः देवः देवता भवति वरुणस्य देवस्य सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब अवभृथ [यज्ञान्त स्नान] को वे स्वीकार करते हैं, तब वरुण [जल] ही देव देवता को पूजते हैं, वरुण देव देवता होता है, वरुण देव के ही सहयोग और सहवास को वे पाते हैं, जो इसको स्वीकार करते हैं । १२ । (अथ यत् उदयनीयया यजन्ते तत् दितिम् एव देवीं देवतां यजन्ते, अदितिः देवी देवता भवति अदित्याः [दित्याः] देव्याः सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति) फिर जब उदयनीया [इष्टि] से यज्ञ करते हैं । तब दिति ही [ दोषखण्डक शक्ति ] देवी देवता को पूजते हैं, अदिति [दिति] देवी देवता होती है, अदिति [ दिति ] के सहयोग और सहवास को वे पाते हैं जो इसको स्वीकार करते हैं । १३ । ( अथ यत् अनूबन्ध्या यजन्ते तत् मित्रावरुणौ एव देवौ देवते यजतः, मित्रावरुणौ देवौ देवते भवतः, मित्रावरुणयोः देवयोः सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब अनूबन्ध्या [ इष्टि ] से यज्ञ करते हैं तब मित्र और वरुण ही [ प्राण और अपान ] देव देवता पूजे जाते हैं, मित्र और वरुण दोनों देव देवता होते हैं, मित्र और वरुण देव के सहयोग और सहवास को वे पाते हैं, जो इस- को स्वीकार करते हैं । १४ । ( अथ यत् त्वाष्ट्रेण पशुना यजन्ते, तत् त्वष्टारम् एव देवं देवतां यजन्ते, त्वष्टा देवः देवता भवति त्वष्टुः देवस्य सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब त्वष्टा [ सूक्ष्म बनाने वाले ] को देवता मानने वाले पशु [ प्राणी अर्थात् आत्मा ] के साथ यज्ञ करते हैं, तब त्वष्टा ही