गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 228, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ४ । क० ८ ॥ वाले ] देव देवता को ही पूजते हैं, त्वष्टा देव देवता होता है त्वष्टा देव के सहयोग और सहवास को वे पाते हैं, जो इसको स्वीकार करते हैं। १५ । ( अथ यद् देविकाः हविर्भिः चरन्ति याः एताः उपसत्सुः भवन्ति, अग्निः, सोमः, विष्णुः इति द्वेव्यः देविकाः देवताः भवन्ति, देवींनां देविकानां देवतानां सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जो देविकायें [ व्यवहार कुशल देवियां ] हवियों [ ग्राह्य पदार्थों ] से काम करती हैं, जो समीप बैठने वाली होती हैं, अग्नि, सोम [ ऐश्वर्यवान् ] विष्णु व्यापक यह देवी देविकायें देवता होती है, देवियों, देविकाओं, और देवताओं के सहयोग और सहवास को वे पाते हैं, जो इसको स्वीकार करते हैं। १६ । ( अथ यत् दशातिरात्रम् उपयन्ति, तत् कामम् एव देवं देवतां यजन्ते कामः देवः देवता भवति, कामस्य देवस्य सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब दशातिरात्र [ यज्ञ ] को वे स्वीकार करते हैं, तब काम [ श्रेष्ठ इच्छा ] ही देव देवता को पूजते हैं, काम देव देवता होता है, काम देव के सहयोग और सहवास को पाते हैं, जो इसको स्वीकार करते हैं। १७ । ( अथ यद् उदवसानीयया यजन्ते, तं स्वर्गम् एव लोकं देवं देवतां यज- न्ते, स्वर्गः लोकः देवः देवता भवति, स्वर्गस्य लोकस्य देवस्य सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब उदवसानीया [ उत्तम समाप्ति योग्य इष्टि ] से यज्ञ करते हैं, उस स्वर्ग लोक ही देव देवता को पूजते हैं, स्वर्ग लोक देव देवता [ प्रधान विषय ] होता है, स्वर्ग लोक देव के सहयोग [ पक्के मेल ] और सहवास [ एक स्थान में निवास ] को वे पाते हैं जो इसको स्वीकार करते हैं ॥ १८ ॥ ( तत् वै एतत् अग्निष्टोमस्य जन्म ) सो यही अग्निष्टोम यज्ञ का जन्म है । ( यः एवम् एतत् अग्निष्टोमस्य जन्म वेद, सः तत् अग्निष्टोमम् आप्त्वा एव स्वर्गे लोके प्रतितिष्ठति ) जो इस प्रकार इस अग्निष्टोम के जन्म को जानता है, वह उससे अग्निष्टोम को पाकर ही स्वर्ग लोक में ठहरता है। (प्रजया पशुभिः प्रतितिष्ठति यः एवं वेद, अग्निष्टोमेन सात्मा सलोकः भूत्वा देवान् अप्येति इति ब्राह्मणम् ) वह प्रजा [ संतान आदि ] से और पशुओं से प्रतिष्ठा पाता है और वही अग्निष्टोम के साथ एक आत्मा वाला और एक निवास वाला होकर उत्तम गुणों को पाता है - यह ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञान ] है ॥ ८ ॥ भावार्थः-कण्डिका ७ के समान है ॥ ८ ॥ विशेषः १-इस कण्डिका का मिलान कण्डिका ७ से करो। २-प्रकरण मिलाने से जान पड़ता है कि [ विश्वेभ्यो देवेभ्यः१ दशरात्रं दिग्भ्यो दशरात्रिकं पृष्ठ्यं षडहमहेभ्यो लोकेभ्यः छन्दोमत् त्र्यहं संवत्सरात् दशम- महः प्रजा-] इतना विषय कण्डिका ६ के [ गवायुषी ] पद के पीछे का कण्डिका आठ में छप गया है। यह भूल एशियाटिक सुसैटी के पुस्तक और जीवानन्द सं. दोनों में है। हमने पुस्तक का मूल और अपना भाष्य प्रकरण के अनुसार ठीक कर दिया है ॥ १. यह पाठ जर्मन सं. में यथास्थान ६ वीं कण्डिका में है ॥ सम्पा० ॥