भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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२०२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ४ । क० १८ ॥ ( देवाः ) विद्वानो ! ( यत्र ) जहाँ पर ( नः ) हमारे लिए ( शतं शरदः ) सौ वर्ष तक ( इत् ) निश्चय करके ( नु ) ही ( तनूनाम् ) अपने शरीरों के ( जरसम् ) बुढ़ापे को ( चक्र ) तुम व्यतीत करो, ( यत्र ) जहाँ पर ( पुत्रासः ) पुत्र लोग ( पितरः ) पिता [ वयोवृद्ध और विद्यावृद्ध पिता के समान ] ( भवन्ति ) होवें, [ वहाँ ] ( नः ) हमारे ( आयुः ) जीवन और ( गन्तोः१ ) गतियों को ( मध्या ) बीच में ( मा रीरिषत ) मत नष्ट करो ॥ ( पूर्वं उपवयसि पुत्राः ह वै एनं पितरम् उपजीवन्ति, उपोत्तमे वयसि पिता पुत्रान् उपजीवति यः एवं वेद ) पहिली अवस्था में पुत्र निश्चय करके इस पिता के ही सहारे जीते हैं और पिछली अवस्था [ संन्यास वा बुढ़ापे ] में पिता पुत्रों के सहारे जीता है जो ऐसा जानता है। ( सः वै एषः संवत्सरः ) वही यह संवत्सर [यज्ञ] है ॥१७॥ भावार्थः-जैसे विषुवान् यज्ञ अभिप्लव और पृष्ठ्य यज्ञ से मिला होता है, वैसे ही पिता और पुत्र प्रीतिपूर्वक परस्पर रक्षा करें ॥ १७ ॥ कण्डिका १८ ॥ अथ हैष महासुपर्णस्तस्य यान् पुरस्ताद्विषुवतः षण्मासानुपयन्ति स दक्षिणः पक्षोऽथ यानावृत्तानुपरिष्टात् षडुपयन्ति स उत्तरः पक्षः आत्मा वै संवत्सरस्य विषुवानङ्गानि पक्षौ यत्र वा आत्मा तत्तत्पक्षौ यत्र वै पक्षौ तदात्मा न वा आत्मा पक्षावतिरिच्यते२ नो पक्षावात्मानमतिरिच्येते इत्येवमु हैव तदपरेषां स्विदितमह्नां परेषामित्यपरेषां चैव परेषां चेति ब्रूयातस वा एष संवत्सरः ॥ १८ ॥ कण्डिका १८ ॥ संवत्सर बड़ा गरुड़, विषुवान् आत्मा और दोनों अर्धसंवत्सर दो पक्ष ॥ ( अथ ह एषः महासुपर्णः, ) फिर यही [ संवत्सर ] बड़ा गरुड़ है। (विषुवतः पुरस्तात् तस्य यान् षट् मासान् उपयन्ति सः दक्षिणः पक्षः, अथ उपरिष्टात् यान् आवृत्तान् षट् उपयन्ति सः उत्तरः पक्षः ) विषुवान् से पहिले उस [ संवत्सर ] के जिन छः महीनों को स्वीकार करते हैं वह दक्षिण पक्ष [ दाहिना पंख ] है, फिर [ विषुवान् से ] पीछे जिन लौटते हुये छह [ महीनों ] को स्वीकार करते हैं वह उत्तर पक्ष [ बायाँ पंख ] है। (संवत्सरस्य वै आत्मा विषुवान् अङ्गानि पक्षौ ) संवत्सर का ही आत्मा [ देह ] विषुवान् और अङ्ग दोनों पंख हैं। ( यत्र वै आत्मा तत् पक्षौ, यत्र वै पक्षौ तत् आत्मा ) १८-( महासुपर्णः ) महागरुडः । पक्षिराजः ( आवृत्तान् ) अभ्यस्तान् पुनः पुनर्वर्त्तमानान् ( आत्मा ) देहः । जीवः ( तत् ) तत्र ( अतिरिच्यते ) अतिरिणक्ति १. पू० सं० "गतीः" इति पाठः ॥ सम्पा० ॥ २. कर्मणि प्रयोगोऽयम्, तदनुसारेण विभक्तिविपरिणामः भवितव्यः । मूलपाठोऽत्र भ्रष्टः प्रतीयते ॥ सम्पा० ॥