गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 259, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५ । क० ५ २२१ कण्डिका ५ ॥ मनुष्य शरीर के दृष्टान्त से संवत्सर अर्थात् वर्ष का वृत्तान्त ॥ ( पुरुषः वाव संवत्सरः ) मनुष्य ही संवत्सर [ वर्ष, बारह महीने का काल ] है । ( पुरुषः एकम् इति संवत्सरः एकम् इति अत्र तत् समम् १ ) मनुष्य एक है और संवत्सर एक है, यह यहाँ उन दोनों में समता है। १ । ( संवत्सरस्य द्वे अहोरात्रे पुरुषे इमौ द्वौ प्राणौ इति अत्र तत् समम् २ ) संवत्सर के दो दिन रात हैं, पुरुष में यह दो प्राण [ प्राण अपान ] हैं, यह यहाँ उन दोनों में समता है। २ । ( संवत्सरस्य त्रयः वै ऋतवः पुरुषे इमे त्रयः प्राणाः इति अत्र तत् समम् ३ ) संवत्सर के तीन ही ऋतु [ग्रीष्म, वर्षा, और शीत] हैं, मनुष्य में यह तीन प्राण [ प्राण, अपान, उदान, ] हैं, यह यहाँ उन दोनों में समता है। ३। ( संवत्सरस्य षट् वै ऋतवः पुरुषे इमे षट् प्राणाः इति अत्र तत् समम् ४ ) संवत्सर के छह ही ऋतु [ वसन्त आदि ] हैं, मनुष्य में यह छह प्राण हैं, यह यहाँ उन दोनों में समता है। ४ । ( सवत्सरस्य सप्त वै ऋतवः पुरुषे इमे सप्त प्राणाः इति अत्र तत् समम् ५ ) संवत्सर के सात ही ऋतु हैं, मनुष्य में यह सात प्राण [ मस्तक के गोलक ] हैं, यह यहाँ उन दोनों में समता है। ५। (संवत्सरस्य द्वादश मासाः पुरुषे इमे द्वादश प्राणाः इति अत्र तत्समम् ६) संवत्सर के बारह महीने [ चैत्र आदि ] हैं। पुरुष में यह बारह प्राण हैं, यह यहाँ उन दोनों में समता है। ६ । ( संवत्सरस्य त्रयोदश मासाः पुरुषे इमे त्रयोदश प्राणाः इति अत्र तत् समम् ७ ) संवत्सर [ लोंद के वर्ष ] के तेरह महीने हैं, पुरुष में यह तेरह प्राण हैं, यह यहाँ उन दोनों में समता है। ७ । ( संवत्सरस्य चतुर्विंशतिः अर्धमासाः, अयम् पुरुषः चतुर्विशः विंशत्यङ्गुलिः चतुरङ्गः इति अत्र तत् समम् ८ ) संवत्सर के चौबीस आधे महीने हैं, और यह पुरुष चौबीस वाला [ अर्थात् ] बीस अङ्गुली वाला और चार अङ्ग [ दो हाथ दो पाँव ] वाला है, यह यहाँ उन दोनों में समता है । ८ । ( संवत्सरस्य षड्विंशतिः अर्धमासाः अयम् पुरुषः षड्विंशः प्रतिष्ठे षड्विंशे इति अत्र तत् समम् ९ ) संवत्सर [ लोंद के वर्ष ] के छब्बीस आधे महीने हैं, यह पुरुष छब्बीस वाला है, दो प्रतिष्ठायें [ पांव की अङ्गुलियों के स्थान ] छब्बीस [ जोड़ ] वाले हैं, यह यहाँ उन दोनों में समता है । ६ । ( संवत्सरस्य त्रीणि शतानि च ह वै षष्टिः च अहोरात्राणि इति, एतावन्तः एव पुरुषस्य प्राणाः, इति अत्र तत् समम् १० ) संवत्सर के तीन सौ साठ [३६०] दिन रात हैं, इतने [३६०] ही पुरुष के प्राण हैं, यह यहाँ उन दोनों में समता है। १० । (संवत्सरस्य ५—(समम्) समत्वम् (चतुर्विंशः) संख्यायाऽव्ययासन्नादूराधिकसङ्ख्याःसंख्येये (पा० २ । २ । २५) चतुरधिका विंशतिः यत्र स चतुर्विंशः । बहुव्रीहौ संख्येये डजबहुगणात् ( पा० ५ । ४ । ७३) चतुर्विंशति-डच् । चतुर्विशतियुक्तः । एवम् अन्यत्रापि सिद्धिः । ( मज्जानः ) श्वन्भुक्षन्पूषन्प्लीहन्० ( उ० १ । १५९ ) ट्मस्जो शुद्घो—कनिन् । अस्थि- साराः ( स्थुरामांसानि ) स्युड संवरणे—कः, टाप्, डस्य रः । स्थुरा त्वचा । त्वचासहितानि मांसबन्धनानि ( स्नावाः ) इण्शीभ्यां वन् ( उ० १ । १५२ ) ष्णा