गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ
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२४२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५ । क० १७,१८ ॥ वह जो [ ब्रह्मा ] कहता है—मुझमें भर्ग [ तेज ] होवे—वह इस पृथिवी को ही लोकों में से कहता है [ १ ], अग्नि को देवों [ दिव्य पदार्थों ] में [ २ ], वसुदेवों [ श्रेष्ठ विद्वानों ] को देवगणों [ विद्वानों के समूहों ] में [ ३ ], गायत्र [ गाने योग्य वेद विद्या ] को छन्दों [ आनन्ददायक कामों ] में [ ४ ], पूर्वदिशा को दिशाओं में [ ५ ], वसन्तऋतु को ऋतुओं में [ ६ ], त्रिवृत् स्तोत्र को स्तोत्रों में [ ७ ], ऋग्वेद [ पदार्थों की स्तुति विद्या ] को वेदों में [ ८ ], होता को होताओं में [ ९ ], वाणी को इन्द्रियों में [ वह कहता है ] [ १० ], ॥ १६ ॥ भावार्थ : और विशेष:—कण्डिका १५ में देखो ॥ १६ ॥ कण्डिका १७ ॥ स यदाह मयि मह इत्यन्तरिक्षमेवैतल्लोकानामाह वायुं देवानां रुद्रान् देवान् देवगणानान्त्रैष्टुभं छन्दसां प्रतीचीन्दिशां ग्रीष्ममृतूनां पञ्चदशं स्तोमानां यजुर्वेदं वेदानामाध्वर्यवं होत्रकाणां प्राणमिन्द्रियाणाम् ॥ १७ ॥ कण्डिका १७ ॥ महः वा महत्त्व को वर्णन ॥ ( सः यत् आह मयि महः इति, अन्तरिक्षम् एव एतत् लोकानाम् आह, वायुं देवानां, रुद्रान् देवान् देवगणानां, त्रैष्टुभं छन्दसां, प्रतीचीं दिशां, ग्रीष्मम् ऋतूनां, पंचदशं स्तोमानां, यजुर्वेदं वेदानाम् आध्वर्यवं होत्रकाणां, प्राणम् इन्द्रि- याणाम् ) वह जो [ ब्रह्मा ] कहता है—मुझमें महः [ महत्त्व ] होवे—वह इस अन्तरिक्ष को ही लोकों में से कहता है [ १ ], वायु को देवों [ दिव्य पदार्थों ] में [ २ ], रुद्र देवों [ पापियों को रुलाने वाले विद्वानों ] को देवगणों [ विद्वानों के समूहों ] में [ ३ ], त्रैष्टुभ [ तीन, कर्म उपासना ज्ञान को स्थिर करने वाली विद्या ] को छन्दों [ आनन्ददायक कर्मों ] में [ ४ ], पश्चिम दिशा को दिशाओं में [ ५ ], ग्रीष्म ऋतु को ऋतुओं में [ ६ ], पंचदश स्तोत्र को स्तोत्रों में [ ७ ], यजुर्वेद [ संगतिकरण विद्या ] को वेदों में [ ८ ], अध्वर्यु को होताओं में [ ९ ], प्राण को इन्द्रियों में [ वह कहता है ] [ १० ] ॥ १७ ॥ भावार्थ : और विशेष:—कण्डिका १५ में देखो ॥ १७ ॥ कण्डिका १८ ॥ स यदाह मयि यश इति दिवमेवैतल्लोकानामाहादित्यं देवानामादित्यान् देवान् देवगणानां जागतं छन्दसामुदीचीन्दिशां वर्षा ऋतूनां सप्तदशं स्तोमानां सामवेदं वेदानामौद्गात्रं होत्रकाणां चक्षुरिन्द्रियाणाम् ॥ १८ ॥
१६—( हौत्रम् ) अण् स्वार्थे । होतारम् ( होत्रकाणाम् ) होतॄणाम् , ऋत्विजाम् ॥ १७—( आध्वर्यवम् ) अण् स्वार्थे । अध्वर्युम् ॥