भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५ । क० १८,२० ॥ २४३ कण्डिका १८ ॥ यश वा कीर्ति का वर्णन ॥ ( सः यत् आह मयि यशः इति दिवम् एव एतत् लोकानाम् आह, आदित्यं देवानाम्, आदित्यान् देवान् देवगणानाम्, जागतं छन्दसाम्, उदीचीं दिशां, वर्षाः ऋतूनां, सप्तदशं स्तोमानां, सामवेदं वेदानाम्, औद्गात्रं होत्रकाणां, चक्षुः इन्द्रियाणाम् ) वह जो [ ब्रह्मा ] कहता है—मुझमें यश [ कीर्ति ] होवे—वह इस प्रकाश लोक को ही लोकों में से कहता है [ १ ], सूर्य को देवों [ दिव्य पदार्थों ] में [ २ ], आदित्य देवों [ अखण्डव्रती ब्रह्मचारियों ] को देवगणों [ विद्वानों के समूहों ] में [ ३ ], जागत [ जगत् के उपकारक ज्ञान ] को छन्दों [ आनन्ददायक कर्मों ] में [ ४ ], उत्तर दिशा को दिशाओं में [ ५ ], वर्षा ऋतु को ऋतुओं में [ ६ ], सप्तदश स्तोत्र को स्तोत्रों में [ ७ ], सामवेद [ मोक्षविद्या ] को वेदों में [ ८ ], उद्गाता को होताओं में [ ६ ], आंख को इन्द्रियों में [ वह कहता है ] [ १० ] ॥ १८ ॥ भावार्थ : और विशेष:—कण्डिका १५ में देखो ॥ १८ ॥ कण्डिका १९ ॥ स यदाह मयि सर्वमित्यप एवैतल्लोकानामाह चन्द्रमसं देवानां विश्वान् देवान् देवगणानामानुष्टुभं छन्दसां दक्षिणां दिशां शरदमृतूनामेकविंशं स्तोमानां ब्रह्मवेदं वेदानां ब्रह्मत्वं होत्रकाणां मन इन्द्रियाणाम् ॥ १६ ॥ कण्डिका १९ ॥ सर्व वा सब ज्ञान का वर्णन ॥ ( सः यत् आह मयि सर्वम् इति, अपः एव एतत् लोकानाम् आह, चन्द्रमसं देवानां, विश्वान् देवान् देवगणानाम्, आनुष्टुभं छन्दसां, दक्षिणां दिशां, शरदम् ऋतूनाम्, एकविंशं स्तोमानां, ब्रह्मवेदं वेदानां, ब्रह्मत्वं होत्रकाणां, मनः इन्द्रि- याणाम् ) वह जो [ ब्रह्मा ] कहता है—मुझ में सब [ ज्ञान ] होवे—वह इस जल को ही लोकों में से कहता है [ १ ] चन्द्रमा [ आनन्ददायक पदार्थ वा लोक ] को देवों [ दिव्य पदार्थों ] में [ २ ], सब विद्वानों को देवगणों [ विद्वानों के समूहों ] में [ ३ ] आनुष्टुभ [ निरन्तर पदार्थों के स्तुति वाले ज्ञान ] को छन्दों [ आनन्ददायक कर्मों ] में [ ४ ], दक्षिण दिशा को दिशाओं में [ ५ ] शरद् ऋतु को ऋतुओं में [ ६ ], एकविंश स्तोत्र को स्तोत्रों में [ ७ ], ब्रह्मवेद [ अथर्ववेद वा ब्रह्मविद्या ] को वेदों में [ ८ ], ब्रह्मा को होताओं में [ ६ ] मन को इन्द्रियों में [ वह कहता है ] [ १० ] ॥ १६ ॥ : भावार्थ: और विशेष:—कण्डिका १५ में देखो ॥ १६ ॥ कण्डिका २० ॥ स वा एष दशधा चतुः सम्पद्यते, दश च ह वै चतुर्विराजोऽक्षराणि तद्गर्भा उपजीवन्ति श्रीर्वै विराड् यशोऽन्नाद्यं श्रियमेव तद्विराजं यशस्यन्नाद्ये प्रतिष्ठापयति १८-( औद्गात्रम् ) अण् स्वार्थे । उद्गातारम् ॥ १६-( ब्रह्मत्वम् ) ब्रह्माणम् ॥