गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 299, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० १ ॥ २६१ वचन बोलता है ] समीपनिवासी पुरुष ही देवों [ विद्वानों ] का ब्रह्मा होता है और दूरनिवासी पुरुष असुरों का [ ब्रह्मा होता ] है । ( एतत् तम् एव पूर्वं सादयति अरिष्टं यज्ञं तनुतात् इति ) इससे उसको ही पहिले वह [ यजमान ] बिठलाता है—वह निर्विघ्न यज्ञ को विस्तृत करे । ( अथ उपविश्य जपति, बृहस्पतिः ब्रह्मा इति ) फिर वह बैठकर [ यह ब्राह्मण वचन ] जपता है—बृहस्पति [ बड़ी बड़ी विद्याओं का स्वामी ] ब्रह्मा है । ( आङ्गिरसः बृहस्पतिः वै देवानां ब्रह्मा, तस्मिन् एव एतत् अनुज्ञाम् इच्छति ) आङ्गिरस [ चारों वेद जानने वाला ] बृहस्पति विद्वानों का ब्रह्मा है, उस [ ब्रह्मा ] में ही वह [ यजमान ] यह नियम चाहता है । ( प्रणीतासु प्रणीयमानासु हविष्कृतः आ उद्वादनात् वाचं यच्छति ) प्रणीताओं [ यज्ञ में जलपात्रों ] के लाये जाने पर हविष्कृत [ हवि की आहुति मन्त्र ] के उच्चारण तक वह [ ब्रह्मा ] वाणी को रोकता है । ( एतत् वै यज्ञस्य द्वारं तद् एतत् अशून्यं करोति ) यही यज्ञ का द्वार है, सो इसको वह अशून्य [ परिपूर्ण वा निर्विघ्न ] करता है । ( स्विष्टकृति इष्टे च अनुयाजानाम् आ प्रसवात् इति एतत् वै यज्ञस्य द्वितीयं द्वारं तत् एव एतत् अशून्यं करोति ) और स्विष्टकृत् [ आहुति ] दिये जाने पर अनुयाजों की उत्पत्ति तक [ वाणी को रोकता है ], यह ही यज्ञ का दूसरा द्वार है, सो इसको वह अशून्य [ निर्विघ्न ] करता है । ( यत् परिधयः परिधीयन्ते यज्ञस्य गोपीथाय परिधीन् परिधत्ते ) जो परिधियें [ घेरे ] चारों ओर किये जाते हैं, यज्ञ की भूमि की रक्षा के लिये वह परिधियों को रखता है । ( यज्ञस्य सात्मत्वाय परिधीन् संमार्ष्टि ) और यज्ञ की चैतन्यता के लिये परिधियों को मार्जन करता है । ( एनं मध्यमम् एव त्रिः पुनाति, त्रयः इमे प्राणाः, प्राणान् एव अभिजयति ) इस मध्यम [ परिधि ] को तीन बार वह शुद्ध करता है, [ प्राण, अपान, उदान, ] तीन प्राण हैं, प्राणों को ही वह जीतता है । ( दक्षिणार्धं त्रिः, त्रयः वै लोकाः लोकान् एव अभिजयति ) दाहिने भाग को तीन बार [ वह शुद्ध करता है ], तीन ही लोक [ स्थान, नाम, जन्म वा जाति, तीन धाम—निरु० ६ । २८ ] हैं, लोकों को ही वह जीतता है । ( उत्तरार्धं त्रिः, त्रयः वै देवलोकाः, देवलोकान् एव अभिजयति ) उत्तर भाग को तीन बार [ वह शुद्ध करता है ], तीन ही [ पृथिवी, ( .पराग्वसुः ) दूरनिवासी पुरुषः ( तम् ) ब्रह्माणम् ( अरिष्टम् ) रिष हिंसायां- क्तः । अहिंसितं निर्विघ्नम् ( तनुतात् ) विस्तारयेत् ( बृहस्पतिः ) बृहतीनां विद्यानां पालकः ( आङ्गिरसः ) चतुर्वेदवेत्ता ( अनुज्ञाम् ) नियमम् ( प्रणीतासु ) यज्ञे जलपात्रविशेषेषु ( यच्छति ) नियमयति ( आ ) मर्यादायाम् ( उद्वादनात् ) उच्चारणात् ( अशून्यम् ) अहीनम् । परिपूर्णम् ( प्रसवात् ) निष्पादनात् ( परिधयः ) वेष्टनानि ( गोपीथाय ) निशीथगोपीथावगयाः । ( उ० २ । १६ ) गो+पा रक्षणे पा पाने वा--थक् । घुमास्थागापाजहातिसां हलि ( पा० ६ । ४ । ६६ ) आकारस्य ईत्वम् । भूमिरक्षणाय । जलाशयाय ( सात्मत्वाय ) सजीवनत्वाय । वृद्धिकरणाय ( संमार्ष्टि ) सम्यक् शोधयति ( मध्यमम् ) मध्ये वर्तमानं खण्डम् ( त्रिः ) त्रिवारम् ( दक्षिणार्धम् ) दक्षिणभागम् ( उत्तरार्धम् ) उत्तरभागम् ( उप )