भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 325

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० १८ ॥ २८७ अभवत् ) इस [ सूक्त ] से ही अवश्य भरद्वाज [ अन्न वा बल वा विज्ञान के धारण करने वाले पुरुष इन्द्र ] ने शस्त्रों को सजाया है, और वह राज्य वाला हुआ है। ( यं कामयेत राष्ट्री स्यात् इति ) वह [ मनुष्य ] जो पदार्थ चाहे, वह राजा होवे । ( तम् एतेन सन्नह्येत्, राष्ट्री ह भवति ) वह [ ब्रह्मा ] उस [ यजमान ] को इस [ सूक्त ] से संनद्ध करे, वह राजा होवे । ( एतेन ह वै इन्द्रः विराजम् अभ्यजयत् ) इससे ही इन्द्र ने विविध प्रकार राज्य जीता है। ( दश एतान् उ आह, दशाक्षरा विराट्, यजमानः एतेन वै वैराजं भ्रातृव्यं वृङ्क्ते ) वह इन दश [ मन्त्रों ] को ही बोलता है, दश अक्षर वाला विराट् छन्द है, यजमान इसमे ही विविध राज में उत्पन्न वैरी को रोकता है । ( तत् उ ह एके एकादश अनु आह, एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुप्, त्रैष्टुभः वज्रः, वज्रेण एव एतत् रक्षांसि अपसेधति ) फिर कोई कोई ग्यारह ही [ मन्त्र ] बोलते हैं, ग्यारह अक्षर वाला त्रिष्टुप् छन्द है, त्रिष्टुप् [ तीन जोड़ अर्थात् बांस, सीङ्ग शल्य अथवा त्रिशूल ] वाला वज्र है, वज्र से ही यह [ इन्द्र सेनापति ] राक्षसों को हटा देता है। ( दक्षिणतः वै देवानां यज्ञम् रक्षांसि अजिघांसन्, तानि अप्रतिरथेन अपाघ्नत ) दक्षिण ओर से [ उपलक्षण से सब दिशाओं से ] ही देवों के यज्ञ को राक्षस नष्ट करना चाहते हैं, उनको वह [ सेनापति ] अप्रतिरथ [ बेरोक युद्ध यात्रा ] से मार गिराता है । ( तस्मात् ब्रह्मा अप्रतिरथं जपन् एति ) इसलिये ब्रह्मा [ चारों वेद जानने वाला ] अप्रतिरथ सूक्त को जपता हुआ [ विचारता हुआ ] चलता है। ( यत् ब्रह्मा अप्रतिरथ जपन् एति, यज्ञस्य अभिजित्यै रक्षसाम् आहत्यै रक्षसाम् अपहत्यै ) जो कि ब्रह्मा [ चतुर्मुखी सेनापति ] अप्रतिरथ सूक्त को जपता हुआ चलता है वह [ यत्न ] यज्ञ की पूरी जीत के लिये और राक्षसों के सर्वनाश के लिये, राक्षसों के सर्व नाश के लिये, होता है ॥ १८ ॥ भावार्थ :—मनुष्य वेदविहित कर्मों को पुरुषार्थ से करके विघ्नों को हटाकर आनन्द भोगें ॥ १८ ॥ विशेष :—प्रतीक वाला मन्त्र अर्थ सहित लिखा जाता है— इन्द्रस्य बाहू स्थविरो वृषाणौ चित्रा इमा वृषभो पारयिष्णू । तौ योक्षे प्रथमो योग आगते याभ्यां जितमसुराणां स्वर्यत् । अथ० १६ । १३ । १, भेद से साम उ० ६ । ३ । ७ ॥ ( इन्द्रस्य ) इन्द्र [परम ऐश्वर्यवान् पुरुष सेनापति ] के ( इमौ ) वाजस्य अन्नस्य बलस्य विज्ञानस्य वा धारकः ( प्रतर्द्दनम् ) शस्त्रसमूहम् ( सम- नह्यत् ) सन्नद्धवान् । सज्जितवान् ( राष्ट्री ) राष्ट्र–इनिः । राज्यवान् ( उ ) अवधारणे ( आह ) कथयति ( वैराजम् ) विविधराज्ये भवम् ( वृङ्क्ते ) वृजी वर्जने । वर्जयति ( अनु ) निरन्तरम् ( आहुः ) कथयन्ति ( त्रैष्टुभः ) त्रिष्टुभ्–अण् स्वार्थे । त्रिष्टुप्,···त्रिवृद् वज्रस्तस्य स्तोभतीति वा—निरु० ७ । १२ । वेणुः शृङ्गम् शल्यम् इति त्रिसन्धियुक्तो वज्रः । त्रिशूलवान् ( अपसेधति ) अपगमयति । निवारयति ( अजिघांसन् ) हन हिंसागत्योः–सन्-लङ् । हन्तुं नाशयितुमैच्छन् ( एति ) गच्छति । प्रवर्तते ( अपहत्यै ) सर्वनाशाय ॥

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य) · पृष्ठ 325, कुल 600 में से · BharatKosha