गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 334, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें३६६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० २३ ॥ तस्मात् सायं गृहमेधीयेन चरन्ति ) फिर जब सायंकाल में गृहमेधीय [ गृहस्थ के कर्तव्य धर्म ] के साथ व्यवहार करते हैं, पुष्टिकारक कर्म ही गृहमेधीय है, सायंकाल में पशुओं का पोषण होता है, इसलिये सायंकाल में गृहमेधीय [ गृहस्थ के कर्तव्य धर्म ] से व्यवहार करते हैं। ( अथ यत् श्वोभूते गृहमेधीयस्य निष्कासमिश्रेण पूर्णदर्व्या चरन्ति पूर्वेद्युः कर्मणा एव एतत् कर्म प्रातः उपसन्तन्वन्ति ) फिर जब आगामी कल्प में हुये गृहमेधीय [ गृहस्थ के कर्तव्य धर्म ] के निकास और संयोग के साथ पूर्ण दर्वी [ भोजन पात्र ] के द्वारा व्यवहार करते हैं. बीते हुये कल्प के कर्म से ही इस कर्म को प्रातःकाल विस्तृत करते हैं । ( अथ यत् प्रातः क्रीडिनः मरुतः यजन्ति, इन्द्रः वै क्रीडिनः मरुतः तस्मात् एनान् इन्द्रेण उपसंहितान् यजति' ) फिर जब प्रातःकाल खिलाड़ी मरुत् देवताओं को यज्ञ करते हैं, इन्द्र ही खिलाड़ी मरुत् है, इसलिये इन [ मरुतों ] को इन्द्र के साथ-साथ यज्ञ करता है। ( अथ यद् अग्निं प्रणयन्ति यम् एव अमुं वैश्वदेवे मन्थन्ति तम् एव तत् प्रणयन्ति ) फिर जब अग्नि को आगे लाते हैं, जिस उस [ अग्नि ] को ही वैश्वदेव यज्ञ में मथते हैं, उसको ही उससे आगे लाते हैं। ( यत् मथ्यते, तस्य ब्राह्मणम् उक्तम् ) जो वह [ अग्नि ] मथा जाता है, उसका ब्राह्मण कहा गया है । [ क० १६, २१ ] । ( अथ यत् सप्तदश सामिधेन्यः, सदृन्तौ आज्यभागौ, विराजौ संयाज्ये, तेषां ब्राह्मणम् उक्तम्) फिर जब सत्रह सामिधेनी [ अग्नि प्रज्वलित करने की ऋचायें ], श्रेष्ठ पदार्थ वाले दो आज्यभाग, दो विराट् छन्द संयाज्या [ नाम ऋचायें ] हैं, उनका ब्राह्मण कहा गया है [ क० १६, २१ ] । ( अथ यत् नव प्रयाजाः नव अनुयाजाः, अष्टौ हवींषि समानानि तु एव, षट् सञ्चराणि ऐन्द्राग्नान्तानि हवींषि भवन्ति तेषां ब्राह्मणम् उक्तम् ) फिर जो नौ प्रयाज, नौ अनुयाज, और आठ समान हवि भो और छह सञ्चार हवि इन्द्र और अग्नि के प्रकरण तक हैं उनका ब्राह्मण कहा गया है [ क० २२ ] । ( अथ यत् महेन्द्रम् अन्ततः यजति, अन्तं वै श्रेष्ठो भजते तस्मात् एनम् अन्ततः यजति ) फिर जब महेन्द्र [परमेश्वर] को अन्त में यज्ञ करता है, अन्त को ही श्रेष्ठो [सेठ, बड़ा धनी] सेवता है, इसलिये इस [ महेन्द्र ] को अन्त में वह यज्ञ करता है । ( अथ यत् वैश्वकर्मणः एककपालः, असौ वै विश्वकर्मा, यः असौ तपति, एतम् एव तेन प्रीणाति ) फिर जब विश्वकर्म देवता वाला एक पात्र में धरा चरु होता है, वह ही विश्वकर्मा [ सबका बनाने वाला ईश्वर ] है जो वह तपाता है, इसको ही उस [ यज्ञ ] से तृप्त करता है । ( अथ यत् ऋषभं गां ददाति, ऐन्द्रः ह यज्ञक्रतुः ) फिर जब बैल और गाय [ क० २२ ] को वह देता है, इन्द्र [ तेज वा ऐश्वर्य ] देवता वाला ही यह यज्ञ व्यवहार है ॥ २३ ॥ दधातेः-क्तः । संयुक्तान् ( गृहमेधीयेन ) गृहमेधिन्-छः । गृहस्थकर्तव्येन धर्मेण यज्ञेन ( चरन्ति ) व्यवहरन्ति ( श्वोभूते ) आगामिदिवसभूते ( निष्कासमिश्रेण ) निस्+कासु शब्दे-घञ् + मिश्र योजने-अच् । निःसारेण सह संयोगेन ( पूर्ण- दर्व्या ) दृ विदारणे-विन् । पूर्णचमसेन ( पूर्वेद्युः ) गतदिवसे ( उपसन्तन्वन्ति ) यथावत् विस्तारयन्ति ( श्रेष्ठो ) बहुधनी ( भजते ) सेवते ( वैश्वकर्मणः ) विश्वकर्मन्-अण् । विश्वकर्मदेवताकः ( विश्वकर्मा ) सर्वकर्ता । सूर्यः परमेश्वरः ( ऋषभम् ) वृषभम् ( गाम् ) धेनुम् ॥