गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 338, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें३०० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० २४ दान करता है। ( अथो एनं देवयज्ञम् एव पितृयज्ञेन व्यावार्त्तयन्ति ) फिर इस देवयज्ञ [ विद्वानों के सत्कार ] को ही पितृयज्ञ [ पितरों माता पिता आदि पालक विद्वानों के सत्कार ] के साथ वर्त्तमान करते हैं। ( अथो दक्षिणासंस्थः वै पितृयज्ञः, तम् एव एतत् उदक्संस्थं कुर्व्वन्ति ) फिर दक्षिण दिशा में रक्खा हुआ ही पितृयज्ञ है, उसको ही इससे उत्तर दिशा में रक्खा हुआ करते हैं। ( अथ यत् कव्यवाहनम् अग्निम् अन्ततः यजति, एतत् स्विष्टकृतः वै पितरः, तस्मात् कव्यवाहनम् अग्निम् अन्ततः यजति ) फिर जब कव्यवाहन [ विद्वानों को हितकारक पदार्थ पहुंचाने वाले ] अग्नि [ तेजस्वी पुरुष ] का सत्कार करता है, इससे सुन्दर इष्ट व्यवहार करने वाले ही पितर लोग होते हैं, इसलिये कव्यवाहन [ विद्वानों को हितकारक पदार्थ पहुँचाने वाले ] अग्नि [ तेजस्वी पुरुष ] का सत्कार करते हैं। (. अथ यत् इडाम् उपहूय अवघ्राय न प्राश्नन्ति, पशवः वै इडाः पशून् नेत् प्रमृणजानीति ) फिर जब अन्न को मंगा कर और सूंघ कर वे अब खाते हैं, पशु [ सब जीव ] ही अन्न [ अन्न के आश्रित ] हैं, पशुओं [ जीवों ] को वह नहीं मारता है। ( अथ यत् सूक्तवाके यजमानस्य आशिषः अन्वाह, यजमानं नेत् प्रमृण- जानीति ) फिर जब सूक्तवाक [ सुन्दर कहे हुये वाक्य वाले यज्ञ ] में यजमान के आशीर्वादों को वह पढ़ता है, यजमान को वह नहीं मारता है। ( अथ यत् पत्नीं न सयाजयन्ति, पत्नीं नेत् प्रमृणजानीति ) फिर जब [ यजमान की ] पत्नी से अब वह यज्ञ कराते हैं, पत्नी को वह नहीं मारता है [ सुरक्षित करता है ]। ( अथ यत् पवित्रवति मार्जयन्ते, शान्तिः वै भेषजम् आपः, शान्तिः एव एषां भेषजम् अन्ततः यज्ञे क्रियते ) फिर जब जल वाले [ पात्र ] में शुद्ध करते हैं, शान्ति ही औषध जल है, शान्ति ही इनकी औषधि अन्त में यज्ञ में की जाती है। ( अथ यत् अध्वर्युः पितृभ्यो निपृणाति, तत् मनुष्याः पितरः पितॄन् अनु जीवान् एव अनुप्रवहन्ति ) फिर जब अध्वर्यु पितरों [ पालक विद्वानों ] को परिपूर्ण करता है, मननशील और पालनकर्ता पुरुष तब पितरों के पीछे-पीछे जीवों को चलाते रहते हैं। (अथो एनं देवयज्ञम् एव पितृयज्ञेन व्यावार्त्तयन्ति) फिर इस देवयज्ञ [ विद्वानों के सत्कार ] को ही पितृयज्ञ [ पितरों माता पिता आदि पालक
ददाति ( व्यावार्त्तयन्ति ) वर्त्तमानं कुर्व्वन्ति ( दक्षिणासंस्थः ) दक्षिणस्यां दिशि सम्यक् स्थितः ( उदक्संस्थम् ) उत्तरस्यां दिशि सम्यक् स्थितम् ( अग्निम् ) विद्वांसं पुरुषम् ( कव्यवाहनम् ) कवि-यत्। कव्यपुरीषपुरीष्येषु ञ्युट् ( पा० ३ । २ । ६५ ) कव्य+वहेर्ण्युट्। कविर्मेधाविनाम-निघ० ३ । १५। कविभ्यो मेधाविभ्यो हितपदार्थानां प्रापकम् ( इडाम् ) अन्नम्-निघ० २ । ७ । ( पशवः ) जीवाः ( प्रमृणजानीति ) क० २४। प्रकर्षेण मृणति हिनस्ति ( आशिषः ) आशीर्वादान् ( न ) सम्प्रति ( पवित्रवति ) उदकनाम-निघ० १ । १२ । ( मार्ज- यन्ते ) शोधयन्ति ( पितृभ्यः ) पितॄन् ( निपृणाति ) पृ पालनपूरणयोः-लट्। नितरां पालयति पूरयति वा ( अनु ) अनुसृत्य ( प्राञ्चः ) पूर्वदिक्स्थाः पुरुषाः • ( अभ्युत्क्रम्य ) अभित उत्थाय ( आदित्यम् ) आदीप्यमानं सूर्य्यम् ( उपतिष्ठन्ते ) सेवन्ते ( उपसङ्क्रामन्ति ) उपसंगत्य गच्छन्ति.. प्राप्नुवन्ति ( दक्षिणाञ्चः ) दक्षिणदिक्स्थाः ( उदञ्चः ) उत्तरदिक्स्थाः ( त्र्यम्बकैः ) त्रि+अम्ब गतौ-