गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० २५ ॥ ३०१ विद्वानों के सत्कार ] के साथ वर्त्तमान करते हैं। ( अथो दक्षिणासंस्थः वै पितृयज्ञः, तम् एव एतत् उदक्संस्थं कुर्वन्ति ) फिर दक्षिण दिशा में रखा हुआ ही पितृयज्ञ है, उसको ही इससे उत्तर दिशा में रखा हुआ करते हैं। ( अथ यत् प्राञ्चः अभ्युत्क्रम्य आदित्यम् उपतिष्ठन्ते, देवलोकः वै आदित्यः, पितृलोकः पितरः, एनम् एव देवलोकं पितृलोकात् उपसङ्क्रामन्ति इति ) फिर जब पूर्ववाले पुरुष उठ करके सूर्य को सेवते हैं, देवलोक [ विद्वानों का स्थान ] ही सूर्य [ समान ] है, पितृलोक [ पितरों का स्थान ] पितर [ पालन करने वाले पदार्थ ] हैं, इस देव लोक को ही पितृलोक से चलकर अच्छे प्रकार प्राप्त करते हैं। ( अथ यत् दक्षिणाञ्चः उत्क्रम्य अग्नीन् उपतिष्ठन्ते प्रीत्या एव तत् देवेषु अन्ततः ऊर्ध्वं चरन्ति ) फिर जब दक्षिण दिशा वाले उठकर अग्नियों को सेवते हैं, प्रीति के साथ ही तब विद्वानों के बीच अन्त में वे ऊंचे चलते हैं। (अथ यत् उदञ्चः अभ्युत्क्रम्य त्रैयम्बकैः यजन्ते, रुद्रम् एव तत् स्वस्यां दिशि प्रीणन्ति ) फिर जब उत्तर वाले पुरुष उठकर त्रैयम्बक [ अर्थात् त्र्यम्बक, तीनों कालों और तीनों लोकों में नेत्र वाले परमेश्वर ] को देवता रखते हुये हवियों से वे पूजते हैं, रुद्र [ दुष्टों को रुलाने वाले परमात्मा ] को ही तब अपनी दिशा में वे प्रसन्न करते हैं। ( अथो एनं देवयज्ञम् एव पितृयज्ञेन व्यावर्तयन्ति ) फिर इस देवयज्ञ [ विद्वानों के सत्कार ] को ही पितृयज्ञ [ पितरों माता पिता आदि पालक विद्वानों के सत्कार ] के साथ वर्त्तमान करते हैं। ( अथो दक्षिणासंस्थः वै पितृयज्ञः, तम् एव एतत् उदक्संस्थं कुर्वन्ति ) फिर दक्षिण दिशा में रखा हुआ ही पितृयज्ञ है, उसको ही इससे उत्तर दिशा में रखा हुआ करते हैं। ( अथ यत् अन्ततः आदित्येष्टया यजति, इयं वै अदितिः, अस्याम् एव एनम् अन्ततः प्रतिष्ठापयति ) फिर जब अन्त में अदिति देवता वाली इष्टि से वह यज्ञ करता है, यह [ पृथिवी ] ही अदिति [ अदीन देवमाता, दिव्य पदार्थों को उत्पन्न करने वाली ] है, इस [ पृथिवी ] पर ही इस [ यजमान ] को अन्त में वह प्रतिष्ठित करता है। ( अथ यत् परस्तात् पूर्णमासेन यजते, तथा ह अस्य पूर्वपक्षे साकमेधैः इष्टं भवति ) फिर जब पीछे से पौर्णमास यज्ञ के साथ वह यज्ञ करता है, उसी प्रकार ही उसका पहिले पखवाड़े में साकमेधों [ क० २३ बल के लिये बुद्धि वाले यज्ञों ] से यज्ञ होता है ॥ २५ ॥ भावार्थः--जैसे यज्ञ में यज्ञदेवताओं के लिये यज्ञपदार्थ एक स्थान से दूसरे ऊंचे स्थान को लाये जाते हैं, वैसे ही मनुष्य एक पद से दूसरे उच्च पद को चढ़ते जावें ॥ २५ ॥ ण्वुल् । तन्वादीनां छन्दसि बहुलम् ( वा० पा० ६ । ४ । ७७ ) इति इयङ् । त्रिषु कालेषु लोकेषु च अम्बकं नेत्रं यस्य स त्र्यम्बकः त्रियम्बकः । ततः अण् । त्रियम्बकदेवताकैः ( आदित्येष्टया ) अदिति--ण्यः । अदितिदेवताकयेष्ट्या ( इयम् ) दृश्यमाना पृथिवी ( अदितिः ) अदीना देवमाता-निरु० ४ । २२ । दिव्य- पदार्थानां जनयित्री ( साकमेधैः ) क० २३ । शाकाय बलाय मेधा येषु तैर्यज्ञैः ॥