भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 600 में से

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३३४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० १३ ॥ इति, बाहुभिः अभिच्युतः अंशुः अधिषवणाभ्याम् अधिस्कन्दति ) जो तेरा अंश [ हमारे ] भुजाओं पर गिरा हुआ प्रकाश वा भूमि की गोद से व्यापक है [ उसी मन्त्र का भाग भेद से ]--बाहुओ' द्वारा प्राप्त हुआ अंश दोनों [ अमृत के ] निचोड़ स्थानों [ प्रकाश और भूमि ] से ऊपर व्यापक होता है। ( अध्वर्योः वा पवित्रात् परि यः ते मनसा वषट्कृतं तं जुहोमि इति ) और जो यज्ञ करने वाले के शुद्ध व्यवहार से चारों ओर तेरी प्राप्ति के लिये मनन के साथ प्राप्त किये हुये उसको मैं ग्रहण करता हूँ-[ यह बोलता है ] । ( तत् यथा वषट्कृतम्, एवं स्वाहाकृतं हुतं भवति ) सो जैसे वषट्कृत [ प्राप्त किया हुआ कर्म ] होता है, उसी प्रकार स्वाहाकृत [ सत्यवाणी से किया हुआ ] यज्ञ होता है ॥ १२ ॥ भावार्थः-जैसे ऋत्विज् लोग सोम यज्ञ को विधानपूर्वक करते हैं, वैसे ही सब मनुष्य अपने कर्तव्य को विचारपूर्वक करें ॥ १२ ॥ विशेषः-प्रतीक वाले मन्त्रों में से एक एक अर्थ सहित लिखे जाते हैं, शेष मन्त्र वेद में देखें-- १-ये अग्नयो अप्स्व१न्तर्ये वृत्रे ये पुरुषे ये अश्मसु । य आविवेशोषधीर्यो वनस्पतींस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत् । अथ० ३ । २१ । १ । (ये) जो (अग्नयः) अग्नियों [ ईश्वर के तेज ] ( अप्सु अन्तः ) जल के भीतर ( ये ) जो ( वृत्रे ) मेघ में ( ये ) जो ( पुरुषे ) पुरुष [ मनुष्य शरीर ] में और ( ये ) जो ( अश्मसु ) शिलाओं में हैं। ( यः ) जिस [ अग्नि ] ने ( ओषधीः ) औषधियों [ अन्न सोमलता आदि ] में और ( यः ) जिसने ( वनस्पतीन् ) वनस्पतियों [ वृक्ष आदि ] में ( आविवेश ) प्रवेश किया है, ( तेभ्यः ) उन ( अग्निभ्यः ) अग्नियों [ ईश्वर तेजों ] को ( एतत् ) यह ( हुतम् ) दान [ आत्मसमर्पण ] ( अस्तु ) होवे ॥ :-द्रप्सश्चस्कन्द पृथिवीमनु द्यामिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः। समानं योनिमनु संचरन्तं द्रप्सं जुहोम्यनु सप्त होत्राः। अथ० १८ । ४ । २८ यजु० १३ । ५. भेद से ऋ० १० । १७ । ११ । ( द्रप्सः ) हर्षकारक परमात्मा ( पृथिवीम् ) पृथिवी और ( द्याम् अनु ) प्रकाश में ( च ) और ( इमम् ) इस ( योनिम् अनु ) घर [ शरीर ] में ( च ) और [ उस शरीर में भी ] ( चस्कन्द ) व्यापक है ( यः ) जो [ शरीर ] ( पूर्वः ) पहिला है । ( समानम् ) [ सर्वसाधारण ] ( योनिम् अनु ) कारण में ( संचरन्तम् ) विचरते हुये ( द्रप्सम् ) हर्षकारक परमात्मा को ( सप्त ) सात ( उ० २ । ८२ ) त्रिधृषा प्रागल्भ्ये--क्युः, धिपादेशः, यद्वा धिषि धारणे--क्युः। धिषणे द्यावापृथिवीनाम--निघ० ३ । ३० । प्रकाशस्य भूमेर्वा ( अधिषवणा- भ्याम् ) सोमस्य अमृतस्य निष्पीड़नस्थानाभ्याम् । द्यावापृथिवीभ्याम् ( पवित्रात् ) शुद्धव्यवहारात् ( जुहोमि ) गृह्णामि ( वषट्कृतम् ) वहनेन कृतम् ( स्वाहाकृतम् ) सत्यवाण्या कृतम् ॥

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