गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 40, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० १ ॥ उससे वह प्रसन्न हुआ, (तम् अब्रवीत्) और उस [चिकने द्रव्य] से बोला--(महत् वै यक्षम् सुवेदम् अविदामहे इति) मैं बड़ा ही पूजनीय हूं, [अच्छे प्रकार जानने योग्य पदार्थ] को हमने जाना है (तत् यत् अब्रवीत्) वह जो उसने कहा-(महत् वै यक्षम् सुवेदम् अविदामहे इति) मैं बड़ा ही पूजनीय हूं सुवेद [अच्छे प्रकार जानने योग्य पदार्थ] को हमने जाना है-(तस्मात् सुवेदः अभवत्) इसलिये वह सुवेद [अच्छे प्रकार जानने योग्य पदार्थ] हुआ। (तम् वै) उस ही (एतम् सुवेदम् सन्तम्) इस सुवेद [अच्छे प्रकार जानने योग्य पदार्थ] होते हुये को (स्वेदः इति आचक्षते) स्वेद [पसीना] कहते हैं। (परोक्षेण) परोक्ष [आंख ओट प्रलय में वर्त्तमान ब्रह्म] के द्वारा (परोक्षप्रियाः इव हि) परोक्षप्रिय [आंख ओट भविष्य के प्रेमी] लोगों के समान ही (देवाः) देवता [विद्वान् लोग] (प्रत्यक्षद्विषः) प्रत्यक्ष [वर्त्तमान अवस्था] के द्वेषी [विरोधी] (भवन्ति) होते हैं [अर्थात् दूरदर्शी लोग ब्रह्म के नियमों को विचार कर, क्षणभङ्गुर वर्त्तमान को छोड़कर आगे को सुधार करके उन्नति करते हैं। योग दर्शन पाद २ सूत्र १६ में कहा है--हेयं दुःखमनागतम्--न आया हुआ अर्थात् आगे का दुःख छोड़ने योग्य है] ॥ १ ॥ भावार्थः-ऋषि लोग विचारते हैं कि प्रलय में भी वर्त्तमान अविनाशी ब्रह्म सृष्टि करने के लिए अपना ज्ञान प्रकट करता है ॥ १ ॥ विशेषः--(सुवेद और अविदामहे) पदों में यह समता मानी है कि दोनों पद एक ही धातु [विद-ज्ञाने] से बने हैं, स्वेद शब्द ष्ष्विदा गात्रप्रसरणे घञ् से पसीना अर्थ में बनता है किन्तु यहां (सुवेद) को ही स्वेद) पसीना माना है ॥ कण्डिका २ स भूयोऽश्राम्यद् भूयोऽतप्यत् भूय आत्मानं समतपत्तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य सर्वेभ्यो रोमगत्तेंभ्यः पृथक् स्वेदधाराः प्रास्यन्दन्त। ताभिरनन्दत्, याम्-घञ् । पूजनीयम् (हन्त) हर्षे, खेदे (मत्) मत्संकाशात् । आत्मनः (मन्मात्रम्) प्रमाणे द्वयसज्दघ्नञ्मात्रचः (पा० ५।२।३७) मत्-मात्रच् । आत्मसदृशम् (निर्ममे) माङ् माने-लडर्थे लिट् । रचयामि । (ललाटे) लल ईप्सायाम्-अच् + अट गतौ-अण् । ललम् = ईप्साम् अटति ज्ञापयतीति ललाटम् । कपाले (स्नेहः) ष्णिह प्रीतो स्नेहने च-घञ् । तैलादिरसः । स्निग्धता (आर्द्रम्) आर्द्र-ण्यञ् । सजलत्वम् (तम्) स्नेहम् (सुवेदम्) विद ज्ञाने-खल् । सुखेन ज्ञेयम् । (अविदामहे) विद ज्ञाने विदॢ लाभे वा-लङ्, छान्दसं रूपम् । वयं ज्ञातवन्तः । वयं लब्धवन्तः (स्वेदः) ष्ष्विदा गात्रप्रसरणे-घञ् । घर्मः, प्रस्रवणम् । अत्र तु सुवेद एव स्वेदः आचक्षते । चक्षिङ् व्यक्तायां वाचि-लट् । समन्तात् कथ- यन्ति परोक्षेण-परोक्षे लिङ् (पा० ३।२।११५) इति निर्देशाद् परस्योकारः । अप्रत्यक्षेण प्रलये वर्त्तमानेन ब्रह्मणा (परोक्षप्रियाः) परोक्षे भविष्ये रुचिराः (इव) यथा (देवाः) विद्वांसः (प्रत्यक्षद्विषः) वर्त्तमानावस्थाविरोधिनः ॥