गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 406, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें३६८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ६ ॥ अपि एतर्हि भूयान् इव मृत्युः ) इसलिये ही अब बहुत अधिक सा मृत्यु है । ( तस्य ह एषा एव शान्तिः एषा प्रतिष्ठा, यत् वाक् इति ) उस [ वषट्कार ] की यह ही शान्ति और यह ही आश्रय है, जो वाक्, [ वाणी ] है । ( वषट्कृत्य वाक् इति अनुमन्त्रयते ) वषट्कार करके वाक्, यह पद मन्त्र के साथ वह बोलता है । ( वषट्कार मां मा प्रमृक्षः, अहं त्वां मा प्रमृक्षम्, बृहता मनः व्यानेन शरीरम् उपह्वये, प्रतिष्ठा असि, प्रतिष्ठां गच्छन् प्रतिष्ठां मा गमयेत् इति ) हे वषट्कार ! मुझको तू मत धो डाल [ मत नष्ट कर ], मैं तुझे न धो डालूं [ न नष्ट करूं ], बड़े प्रयत्न के साथ [ अपने ] मन को और व्यान [ शरीर में फैले हुये वायु ] के साथ शरीर को मैं बुलाता हूं, तू प्रतिष्ठा [ आश्रय ] है, आश्रय पाता हुआ तू मुझको आश्रय पहुँचा [ यह ब्राह्मण वचन है ] । ( तत् उ ह स्म आह, दीर्घम् एव एतत् सत् अप्रभु, ओजः सहः ओजः इति अनुमन्त्रयेत् ) कोई [ ब्रह्मवादी ] यह कहता है—यह [ मन्त्र वाक्य ] लम्बा होता हुआ भी असमर्थ है, ओजः सहः ओजः—इस [ तीन पद वाले मन्त्र ] को मन्त्र के साथ बोले । [ दूसरा ओजः पद आदरार्थ है ] । ( ओजः च ह वै सहः च वषट्कारस्य प्रियतमे तन्वौ, प्रियाभ्याम् एव तनूभ्यां तत् समर्धयति ) ओजः [ पराक्रम ] और सहः [ बल ] ही वषट्कार के दो अति प्रिय शरीर हैं, दोनों प्रिय शरीरों से ही उस [ यजमान ] को वह बढ़ाता है । ( प्रियया तन्वा समृद्ध्यते, यः एवं वेद ) वह पुरुष प्रिय शरीर से बढ़ता है जो ऐसा जानता है ॥ ५ ॥ भावार्थः—प्रकरण के अनुकूल मन्त्रों के विनियोग से यजमान का बल और पराक्रम बढ़ता है ॥ ५ ॥ विशेषः १—इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ३ । ८ से मिलाओ ॥ विशेषः २—( प्रतिष्ठामि ) के स्थान पर ( प्रतिष्ठासि ), ( सदः प्रभू ) के स्थान पर ( सदप्रभु ) और ( वषट्कारञ्च ) के स्थान पर ( वषट्कारस्य ) ऐतरेय ब्राह्मण से शोधा गया है । कण्डिका ६ ॥ वाक् च वै प्राणापानौ च वषट्कारः ते वषट्कृते वषट्कृते व्युत्क्रामन्ति । ताननुमन्त्रयते, वागोजः सह ओजो मयि प्राणापानाविति । वाचं चैव तत् प्राणापानौ च होता आत्मनि प्रतिष्ठापयति, सर्वमायुरेति, न पुरा जरसः प्रमीयते, इदानीम् ( भूयान् ) बहु-ईयसुन् । बहुतरः ( वाक् ) वाणी । विद्या ( अनुमन्त्रयते ) मन्त्रेण सह उच्चारयति ( मा प्रमृक्षः ) मृजी शौचे—लुङ् । मा शोधय । मा विनाशय ( मा प्रमृक्षम् ) विनष्टं मा कार्षम् ( बृहता ) महता प्रयत्नेन ( मनः ) स्वकीयं चित्तम् ( उपह्वये ) आह्वयामि ( व्यानेन ) व्यानादिवायुना ( प्रतिष्ठा ) आश्रयः ( गच्छन् ) प्राप्नुवन् ( गमयेत् ) गमय, प्रापय ( सत् ) वर्तमानम् ( अप्रभु ) असमर्थम् ( ओजः सहः ओजः ) पदत्रयात्मको मन्त्रः ( ओजः ) पराक्रमः ( सहः ) बलम् ( समर्धयति ) प्रवर्धयति ॥