भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 407, कुल 600 में से

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पृष्ठ 407

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ६ ॥ ३६६ य एवं वेद । शन्नो भव हृद आ पीत इन्दो पितेव सोम सूनवे सुशेवः । सखेव सख्य उरुशंस धीरः प्रण आयुर्जीवसे सोम तारीरित्यात्मानं प्रत्याभिमृशति, ईश्वरो वा एषोऽप्रत्यभिमृष्टो यजमानस्यायुः प्रत्यवहर्तुमनर्हन्मा भक्षयेदिति । तद्यदेतेन प्रत्याभिमृशति आयुरेवास्मै तत् प्रतिरते । आ प्यायस्व सन्ते पयांसीति द्वाभ्यां चमसानाप्याययन्त्यभिरूपाभ्याम् । यद् यज्ञेऽभिरूपं, तत् समृद्धम् ॥ ६ ॥ कण्डिका ६ ॥ वाक् और प्राण और अपान ही वषट्कार हैं ॥ ( वाक् च प्राणापानौ च वै वषट्कारः ) वाक् और प्राण और अपान ही वषट्कार [ आहुति दान ] हैं । ( ते वषट्कृते वषट्कृते व्युत्क्रामन्ति ) वे [ तीनों ] बार बार वषट्कार करने पर बाहिर चले जाते हैं । ( तान् अनुमन्त्रयते, वाक् ओजः सहः ओजः प्राणापानौ मयि इति ) उनको इस मन्त्र से अनुकूल करता है—वाक्, ओजः [ पराक्रम ], सहः [ बल ], ओजः, और प्राण और अपान मुझमें [ होवें ] । ( तत् वाचं च एव प्राणापानौ च होता आत्मनि प्रतिष्ठापयति, सर्वम् आयुः एति, जरसः पुरा न प्रमीयते यः एवं वेद ) उससे वाणी और प्राण और अपान को होता अपने में दृढ़ स्थापित करता है, वह पुरुष पूर्ण आयु पाता है और बुढ़ापे से पहिले नहीं मरता, जो ऐसा जानता है । ( शन्नो भव हृद आ पीत इन्दो पितेव सोम सूनवे सुशेवः । सखेव सख्य उरुशंस धीरः प्रण आयुर्जीवसे सोम तारीः ) । ( इन्दो ) हे बड़े ऐश्वर्य वाले ( सोम ) हे सोम ! [ सर्वजनक परमेश्वर ] ( पीतः ) [ हम लोगों से ] ग्रहण किया गया ( सुशेवः ) बड़ा सुख देने वाला तू ( नः हृदे ) हमारे हृदय के लिये, ( पिता इव सूनवे ) पिता के समान पुत्र के लिये ( शम् ) सुखदायक ( आ भव ) सब ओर से हो, ( उरुशंस ) हे बड़ी प्रशंसा वाले ! ( सोम ) हे सोम ! [ सर्वप्रेरक परमात्मन् ] ( धीरः ) बुद्धिमान् तू, ( सखा इव सख्ये ) मित्र के समान मित्र के लिये, ( नः आयुः ) हमारा आयु ( जीवसे ) जीने के लिये ( प्र तारीः ) बढ़ा—ऋ० ८ । ४८ । ४— ( इति आत्मानं प्रत्याभिमृशति ) इस मन्त्र से वह अपने शरीर को भले प्रकार छूता है । ( एषः अप्रत्यभिमृष्टः यजमानस्य आयुः प्रत्यवहर्तुम् ईश्वरः वै, अनर्हन् मा भक्षयेत् इति) यह अङ्ग बिना छुये [ मन्त्र ] यजमान का आयु नाश करने को समर्थ होता है, अयोग्य होकर वह मुझे खा जायेगा [ यह विचार करे ] । ( तत् यत् एतेन प्रत्याभिमृशति आयुः एव अस्मै तत् प्रतिरते ) सो जो इस [ पूर्वोक्त मन्त्र ] से अङ्ग स्पर्श करता है, ६—( व्युत्क्रामन्ति ) बहिरूध्वं गच्छन्ति ( शम् ) सुखम् ( नः ) अस्मा- कम् ( हृदे ) हृदयाय ( आ ) समन्तात् ( पीतः ) गृहीतः ( इन्दो ) हे परमैश्वर्य- वन् ( सोम ) सर्वोत्पादक सर्वप्रेरक परमेश्वर ( सूनवे ) पुत्राय ( सुशेवः ) शेवं सुखनाम—निघ० ३ । ६ । सुसुखयुक्तः ( उरुशंस ) बहुधा प्रशंसनीय । बहुकीर्ते ( धीरः ) धीमान् ( जीवसे ) जीवनाय ( प्र तारीः ) प्रवर्धय ( प्रत्याभिमृशति ) हस्तेन सर्वतः स्पृशति ( अप्रत्याभमृष्टः ) मन्त्रेण स्पर्शरहितः ( प्रत्यवहर्तुम् ) विनाशयितुम् ( अनर्हन् ) अयोग्यः सन् ( प्रतिरते, ) प्रवर्धयति ( आ ) समन्तात् २४