भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 418, कुल 600 में से

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पृष्ठ 418

३८० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १० ॥ कण्डिका १० ॥ प्रातःसवन, माध्यन्दिन और तृतीयसवन में विशेषता से मन्त्रों का प्रयोग ॥ ( देवविशः कल्पयितव्यः इति छन्दः छन्दसि प्रतिष्ठाप्यम् इति आहुः ) देवताओं की प्रजायें बनाई जावें और छन्द [ वेद ] छन्द [ वेद के आधार परमात्मा ] में रखा -- जावे—ऐसा वे [ ब्रह्मवादी ] कहते हैं। (शंसावोम्—इति प्रातःसवने त्र्यक्षरेण आह्वयते) ( शंसाव ओम् ) हम दोनों स्तुति करें, अच्छा ! प्रातःसवन में इस तीन अक्षर वाले वाक्य से वह [ होता अध्वर्यु से ] कहता है। ( शंसावो देव--इति अध्वर्युः पञ्चाक्षरं प्रतिगृणाति ) ( शंसावः दैव ) हम दोनों स्तुति करते हैं, हे देव ! अध्वर्यु इस पांच अक्षर वाले वाक्य को उत्तर में बोलता है। ( तत् अष्टाक्षरं सम्पद्यते ) उससे [ शंसावोम् + शंसावो दैव—पहिला और दूसरा वाक्य मिल कर ] आठ अक्षर वाला वाक्य बनता है। ( अष्टाक्षरा वै गायत्री, गायत्रीम् एव एतत् पुरस्तात् प्रातःसवने अचीक्लपताम् ) आठ अक्षर वाला ही गायत्री [ छन्द ] है, गायत्री [ स्तुति योग्य वेद विद्या ] को ही इससे आरम्भ में प्रातःसवन के बीच उन दोनों ने ठहराया है। ( उक्थं वाचि--इति शस्त्वा चतुरक्षरम् आह ) ( उक्थं वाचि ) स्तोत्र [ मेरी ] वाणी में है—स्तोत्र पढ़के यह चार अक्षर वाला वाक्य वह [ होता ] बोलता है। ( ओम् उक्थशाः-इति अध्वर्युः चतुरक्षरं प्रतिगृणाति ) ( ओम् उक्थशाः ) हां, तू स्तोत्र बोलने वाला [ हो ]—अध्वर्यु यह चार अक्षर वाला वाक्य उत्तर में बोलता है। ( तत् अष्टाक्षरं सम्पद्यते ) उससे [ उक्थं वाचि + ओम् उक्थाः-पहिला और दूसरा वाक्य मिलकर ] आठ अक्षर वाला वाक्य बनता है। ( अष्टाक्षरा वै गायत्री, गायत्रीम् एव एतत् उभयतः प्रातःसवने अचीक्लपताम् ) आठ अक्षर वाला ही गायत्री छन्द है, गायत्री [ गाने योग्य वेद विद्या ] को ही इससे दोनों ओर [ स्तोत्र के पहिले और पीछे ] प्रातःसवन में उन दोनों ने ठहराया है ॥ ( अध्वर्यो शंसावोम्—इति माध्यन्दिने षडक्षरेण आह्वयते ) ( अध्वर्यो शंसावोम् ) हे अध्वर्यु ! हम दोनों स्तुति करें, अच्छा ! माध्यन्दिन यज्ञ में इस छह अक्षर वाले वाक्य से वह [ होता अध्वर्यु से ] कहता है। ( शंसावो दैव—इति अध्वर्युः पञ्चाक्षरं प्रतिगृणाति ) ( शंसावः दैव ) हम दोनों स्तुति करते हैं, हे देव ! अध्वर्यु इस पांच अक्षर वाले वाक्य को उत्तर में बोलता है। ( तत् एकादशाक्षरं सम्पद्यते ) उससे [ अध्वर्यो शंसावोम् + शंसावो दैव--पहिला और दूसरा वाक्य मिलकर ] ग्यारह अक्षर वाला वाक्य बनता है। ( एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुप्, त्रिष्टुभम् एव एतत् पुरस्तात् माध्यन्दिने अचीक्लपताम् ) ग्यारह अक्षर वाला ही त्रिष्टुप् छन्द है, त्रिष्टुप् [ तीन कर्म, उपासना और ज्ञान से पूजित ब्रह्म ] को ही इससे आरम्भ में माध्यन्दिन सवन के बीच उन दोनों ने ठहराया है। ( उक्थं वाचीन्द्राय--इति शस्त्वा षडक्षरम् आह ) ( उक्थं वाचि इन्द्राय ) स्तोत्र [ मेरी ] वाणी में इन्द्र के लिये है—स्तोत्र पढ़कर यह छह अक्षर वाला वाक्य वह [ होता ] १०—(देवविशः) देवानां प्रजाः (कल्पयितव्याः) सम्पादनीयाः (प्रतिष्ठाप्यम् ) प्रतिष्ठापनीयम् ( शंसाव ) आवां शंसनं स्तोत्रं करवाव (ओम् ) अनुमती ( शंसावः )