भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 419, कुल 600 में से

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पृष्ठ 419

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १० ३८१ बोलता है। (ओम॒क्थशा॑: यज-इति अध्व॒र्युः पञ्चाक्षरं प्रतिगृणाति ) हां, स्तुति बोलने वाला तू यज्ञ कर--अध्वर्यु यह पांच अक्षर वाला वाक्य [ उक्थ = उक्थ ] उत्तर में बोलता है। (तत् एकादशाक्षरं सम्पद्यते) उससे [ उक्थं वाचीन्द्राय + ओमुक्थशा यज-पहिला और दूसरा वाक्य मिलकर ] ग्यारह अक्षर वाला वाक्य बनता है। ( एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुप् त्रिष्टुभम् एव एतत् उभयतः माध्यन्दिने अचीक्लृपताम् ) ग्यारह अक्षर वाला ही त्रिष्टुप् छन्द है, त्रिष्टुप् [ तीन कर्म, उपासना और ज्ञान से पूजित ब्रह्म ] को ही इससे दोनों ओर [ स्तोत्र के आदि और अन्त में ] माध्यन्दिन सवन के बीच उन दोनों [ होता और अध्वर्यु ] ने ठहराया है ॥ (अध्वर्यो शंशा॑सावोम्-इति तृतीयसवने सप्ताक्षरेण आह्वयते ) ( अध्वर्यो शंशांसाव ओम् ) हे अध्वर्यु ! हम दोनों स्तुति करें, अच्छा ! तृतीयसवन में इस सात अक्षर वाले वाक्य से वह [ होता अध्वर्यु से ] कहता है। ( शंसावो दैव-इति अध्वर्युः पञ्चाक्षरं प्रतिगृणाति ) ( शंसावः दैव ) हम दोनों स्तुति करते हैं, हे देव ! अध्वर्यु इस पांच अक्षर वाले वाक्य को उत्तर में बोलता है। ( तत् द्वादशाक्षरं सम्पद्यते ) उससे [ अध्वर्यो शंशासावोम् + शंसावो दैव--पहिला और दूसरा वाक्य मिलकर ] बारह अक्षर वाला वाक्य बनता है। ( द्वादशाक्षरा वै जगती, जगतीम् एव एतत् पुरस्तात् तृतीयसवने अचीक्लृपताम् ) बारह अक्षर वाला ही जगती छन्द है, जगती [ जगत् का उपकार करने वाली वेद विद्या ] को ही इससे आरम्भ में तृतीयसवन के बीच उन दोनों ने ठहराया है। ( उक्थं वाचीन्द्राय देवेभ्यः—शस्त्वा इति नवाक्षरम् आह) ( उक्थं वाचि इन्द्राय देवेभ्यः ) स्तोत्र [ मेरी ] वाणी में इन्द्र [ परमेश्वर ] को दिव्य गुणों के पाने के लिये हैं— स्तोत्र पढ़कर यह नौ अक्षर वाला वाक्य [ होता ] बोलता है। (ओम् उ॒क्थशाः--इति अध्वर्युः त्र्यक्षरं प्रतिगृणाति ) ( ओम् उक्थशाः ) हां ! तू स्तुति पढ़ने वाला हो-अध्वर्यु इस तीन अक्षर वाले वाक्य को उत्तर में बोलता है [ इस वाक्य में एक स्वर के लोप से तीन अक्षर माने हैं, ऊपर चार अक्षर कह आये हैं ] । ( तत् द्वादशाक्षरं सम्पद्यते ) इससे बारह अक्षर वाला वाक्य बनता है। ( द्वादशाक्षरा वै जगती, जगतीम् एव एतत् उभयतः तृतीयसवने अचीक्लृपताम् इति ) बारह अक्षर वाला ही जगती छन्द है, जगती [जगत् का उपकार करने वाली वेद विद्या ] को ही इस से दोनों ओर [ स्तुति के आदि और अन्त में ] तृतीय सवन के बीच उन दोनों [ होता और अध्वर्यु ] ने ठहराया है ॥ ( एतत् वै तच्छन्दः छन्दसि प्रतिष्ठापयति, देवविशः एव कल्पयति, यः एवं वेद ) इस से ही वह [ यजमान ] छन्द [ वेद ] को छन्द [ वेद के आधार परमात्मा ] में स्थापित करता है और देवताओं की प्रजाओं की भी कल्पना करता है, जो ऐसा जानता है। आवां स्तुवः ( दैव ) देव--अञ् स्वार्थे। हे देव। विद्वन् ( प्रतिगृणाति ) प्रत्युत्तरं ब्रूते ( सम्पद्यते ) सम्यक् प्राप्नोति (पुरस्तात् ) आदौ। आरम्भे (अचीक्लृपताम् ) तौ कल्पितवन्तौ (उक्थम् ) शंसनम् । स्तोत्रम् (वाचि ) मम वाचि वर्तते ( शस्त्वा ) स्तोत्रं पठित्वा ( उक्थशाः) गो० उ० ३ । ६ । मन्त्रशंसिनः (उभयतः) स्तोत्रस्य