गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 435, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १८ ॥ ३९७ की प्राप्ति के लिये बनाता है। (द्वाभ्यां गार्हपत्ये अध्वर्युः जुहोति, अस्य आक्रान्तेन तेन आग्नेय्या आग्नीध्रीये अन्तरिक्षम् आक्रामयति) दोनों [स्वर्ग और प्रजा] के लिये गार्हपत्य [अग्नि] में अध्वर्यु हवन करता है, और इस [यजमान] को प्राप्त हुये उस [कर्म] से आग्नेयी [अग्नि देवता वाली ऋचा] से आग्नीध्रीय [अग्नि प्रकाशक व्यवहार] के बीच अन्तरिक्ष [मध्य लोक] में पहुँचाता है। (यत् माध्यन्दिने सवने दक्षिणाः नीयन्ते, एतेन स्वर्गे लोके हिरण्यं हस्ते भवति) जो माध्यन्दिन सवन में दक्षिणायें दी जाती हैं, इससे स्वर्ग लोक के बीच सुवर्ण [यजमान के] हाथ में होता है। (अथ सत्यं वै हिरण्यं नयति, सत्येन एव एनं तत् नयति, अग्रेण गार्हपत्यं जघनेन सदः, आग्नीध्रीयं च सदः च अन्तरा) फिर सत्य ही सुवर्ण पहुँचाता है, सत्य से ही इस [यजमान] को वह [सुवर्ण] ले चलता है, [अर्थात्] पहिले [सत्य] से गार्हपत्य यज्ञ में और दूसरे [सुवर्ण] से सद [सभा] में [पहुँचाता] है, [और फिर] आग्नीध्रीय [अग्नि प्रकाश स्थान] और सभा के बीच [वह पहुँचाता है]। (ताः उदीचीः आग्नी- ध्रीयं च सदः च अन्तरा चात्वालम् उत्सृजन्ति) उन उत्तर दिशाओं में आग्नीध्रीय और सभा के बीच चात्वाल [यज्ञ कुण्ड] वे [होता लोग] बनाते हैं। (एतेन ह स्म वै अङ्गिरसः स्वर्गं लोकम् आयन्) इस [व्यवहार] से ही निश्चय करके अङ्गिराओं [वेदवेत्ता लोगों] ने स्वर्ग लोक [सुख स्थान] पाया है। (ताः वै एताः पन्थानम् अभिवहन्ति) वे ही यह [दक्षिणायें] मार्ग चलाती हैं ॥ १७ ॥ भावार्थः—क्रमानुसार कार्य करने से मनुष्य उन्नति करते हैं ॥ १७ ॥ कण्डिका १८ ॥ आग्नीध्रेऽग्रे ददाति। यज्ञमुखं वा अग्नीत्, यज्ञमुखेनैव तद्यज्ञमुखं सम- र्धयति। ब्रह्मणे ददाति। प्राजापत्यो वै ब्रह्मा, प्रजापतिमेव तेन प्रीणाति। ऋत्वि- ग्भ्यो ददाति, होत्रा एव तया प्रीणाति। सदस्येभ्यो ददाति, सोम १पीथंस्तया निष्क्रीणीते। न हि तस्मा अर्हन्ति सोम १पीथं तया निष्क्रीणीयात्। यां शुश्रूषव आर्षेयाय ददाति, देवलोके तयाध्नोति। यामशुश्रूषवेऽनार्षेयाय ददाति, मनुष्यलोके तयाध्नोति। यामं प्रसुप्ताय ददाति, वनस्पतयस्तया प्रधन्ते। यां याचमानाय ददाति, भ्रातृव्यन्तया जिन्वीते। यां भीषाक्षत्रं, तया ब्रह्मातीयात्। यां प्रतिनुदन्ते सा व्याघ्री दक्षिणा। यस्तां पुनः प्रतिगृह्णीयात्, व्याघ्री ह्येनं भूत्वा प्रब्लीनी- यात्। अन्यया सह प्रतिगृह्णीयात्, अथ हैनन्न प्रब्लीनाति ॥ १८ ॥ (आग्नेय्या) अग्निदेवताकया ऋचा (आग्नीध्रीये) आग्नीध्र—छः। आग्नीध्रस्य अग्निप्रकाशकस्य व्यवहारे गृहे वा (जघनेन) जघन्येन। अधमेन। द्वितीयेन— इत्यर्थः (अन्तरा) मध्ये (चात्वालम्) स्यात्तत्तिमृजेरालज्वलजालियचः (उ० १। ११६) चते याचने—वालच्। यज्ञकुण्डम् (अङ्गिरसः) वेदवेत्तारः (आयन्) प्राप्तवन्तः ॥ १. पू. सं. 'सोमपीथः' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥