भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 436, कुल 600 में से

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पृष्ठ 436

३९८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १८ ॥ कण्डिका १८ ॥ दक्षिणापात्र, लोगों का क्रम ॥ (आग्नीध्रे अग्रे ददाति) आग्नीध्र [अग्नि प्रकाशक ऋत्विज्] को पहिले वह [यजमान दक्षिणा] देता है। (अग्नीत् वै यज्ञमुखं यज्ञमुखेन एव तत् यज्ञमुखं समर्धयति) अग्नीत् [अग्नि प्रकाशक] यज्ञ का मुखिया है, यज्ञ के मुखिया द्वारा ही तब यज्ञ के मुख [आरम्भ] को वह समृद्ध [परिपूर्ण] करता है। (ब्रह्मणे ददाति) ब्रह्मा को देता है। (प्राजापत्यः वै ब्रह्मा, प्रजापतिम् एव तेन प्रीणाति) प्रजापति [परमेश्वर] देवता वाला ही ब्रह्मा है, प्रजापति को ही उससे [दान से] वह प्रसन्न करता है। (ऋत्विग्भ्यः ददाति, होत्राः एव तया प्रीणाति) ऋत्विजों को वह देता है, ऋत्विजों को ही उस [दक्षिणा] से वह प्रसन्न करता है। (सदस्येभ्यः ददाति, सोमपीथं तया निष्क्रीणीते) सदस्यों [दूसरे ऋत्विजों] को देता है, सोमपान [तत्त्वरस पीने] को उस [दक्षिणा] से वह मोल लेता है। (तस्मै सोमपीथं न हि अर्हन्ति, तया निष्क्रीणी- यात्) उस [पुरुष] के लिये सोमपान नहीं योग्य है, उस [दक्षिणा] से वह मोल लेवे। (यां शुश्रूषवे आर्षेयाय ददाति, तया देवलोके ऋध्नोति) जो [दक्षिणा] सेवा करने वाले वेदवेत्ता को देता है, उससे देवलोक [विद्वानों के समाज] में वह बढ़ता है। (याम् अश्रुश्रूषवे अनार्षेयाय ददाति, तया मनुष्यलोके ऋध्नोति) जो [दक्षिणा] सेवा करने वाले से भिन्न और वेद जानने वाले से भिन्न पुरुष को देता है, इससे मनुष्य लोक में वह बढ़ता है। (यामं [यां] प्रसृप्ताय ददाति, वनस्पतयः तया प्रथन्ते) जो [दक्षिणा] प्रसृप्त [विस्तृत सामान्य अधिकारी विशेष] को देता है, वनस्पतियां उससे फैलती हैं। (यां याचमानाय ददाति, भ्रातृव्यं तया जिन्वीते ' जो दक्षिणा मांगने वाले को देता है, वैरी को उससे वह प्रसन्न करता है [क्षमा देता है]। (यां भीषाक्षत्रं, तया ब्रह्म अति ईयात्) जो [दक्षिणा] भय के व्यवहार से रक्षा करने वाले को [वह देता है], उससे ब्रह्म [धन] को अत्यन्त करके वह पाता है। (यां प्रति- नुदन्ते सा दक्षिणा व्याघ्री) जिसको वे [ऋत्विज् लोग] लौटा देते हैं, वह दक्षिणा व्याघ्री [के समान भयानक] है। (यः तां पुनः प्रतिगृह्णीयात्, व्याघ्री हि भूत्वा एनं प्रच्छीनीयात्) जो [यजमान] उस [दक्षिणा] को फिर लौटा लेवे, वह १८-(आग्नीध्रे) आग्नीध्राय। अग्निप्रकाशकाय (अग्नीत्) अग्निप्रज्वा- लकः (समर्धयति) सम्यग् वर्धयति (होत्राः) स्त्रीलिङ्गो बहुवचनान्तः। ऋत्विग्- विशेषान् (निष्क्रीणीते) मूल्येन गृह्णाति (शुश्रूषवे) सेवाशीलाय। उपासकाय (आर्षेयाय) ऋषि-ढक्, ऋषिवेदः। वेदज्ञाय (देवलोके) विदुषां समाजे (ऋध्नोति) वर्धते (अशुश्रूषवे) सेवकाद् भिन्नाय (अनार्षेयाय) वेदज्ञाद् भिन्नाय (यामं) याम् (प्रसृप्ताय) विस्तृताय पुरुषाय (जिन्वीते) जिवि प्रीणने, आर्षरूपम्। जिन्वति। प्रीणाति (भीषाक्षत्रम्) ञिभी भये-अङ् । टाप्, षुक् च+अक्षू व्याप्तौ-अच्+त्रैङ् पालने-कः। भीषायाः भयस्य अक्षाद् व्यवहाराद् रक्षकाय (ब्रह्म) धनम्- निघ० २।१०। (अति) अत्यन्तम् (ईयात्) प्राप्नुयात् (प्रतिनुदन्ते) प्रतिकूलं