गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३ ॥ इतराः) और दूसरी [ जलधारायें ] ( पेयाः ) पीने योग्य, (स्वाद्व्यः) रोचक और (शान्ताः) शान्त थीं, (ताः तत्र एव अभि अश्राम्यत्) उनको वहाँ ही उसने सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्) सब ओर से तपाया, (सम् अतपत्) भली भाँति तपाया। (ताभ्यः शान्ताभ्यः तप्ताभ्यः सन्तप्ताभ्यः) उन दबाई हुई, तपाई हुई, भली भाँति तपाई हुई [ जल धाराओं ] से ( यत् रेतः आसीत् ) जो बीज हुआ, (तत् अभृज्यत) वह पक गया [ अथवा चमक उठा ] । ( यत् अभृज्यत ) जो वह पक गया [वा चमक उठा], (तस्मात्) उससे (भृगुः) वह भृगु [भर्ग वाला अर्थात् चमकीला तत्त्व विशेष ] ( सम् अभवत् ) उत्पन्न हुआ, (तत्) वह (भृगोः) भृगु का (भृगुत्वम्) भृगुपन [पक्वपन वा चमकीलापन] हैं। (भृगुः इव वै) भृगु के समान ही (सः सर्वेषु लोकेषु भाति) वह सब लोकों [जीवों] में चमकता है, (यः एवं वेद) जो ऐसा विद्वान् है ॥ ३ ॥ भावार्थः-ब्रह्म ने जल रूप तत्त्व के दो रूप किये एक अतिसूक्ष्म परमाणु रूप जिसको हम ग्रहण नहीं कर सकते, और दूसरा स्थूल रूप प्रकाश आदि ॥ विशेषः-१ अभृज्यत तथा भृगुः दोनों पद भ्रस्ज पाके दीप्तौ च इस एक ही धातु से बने हैं यह दोनों में समता है ॥ विशेषः-२ मनु महाराज म० १ श्लोक ८, ६, १२, १३ में ऐसा कहते हैं-सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥ ८ ॥ तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् । तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥ ६ ॥ तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् । स्वयमेवात्मनो ध्यानादण्डमकरोद् द्विधा ॥ १२ ॥ ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे । मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम् ॥ १३ ॥ उस [ परमात्मा ] ने अपने शरीर से अनेक प्रजावें उत्पन्न करने की इच्छा करते हुए सब ओर से ध्यान करके अप् [ जल तत्त्व ] को पहिले उत्पन्न किया और उसमें बीज छोड़ दिया ॥ ८ ॥ वह [ बीज ] सूर्य के समान प्रकाशवाला चमकीला अण्डा हो गया, उस अण्डे में सब लोगों का पितामह ब्रह्मा [ परमात्मा ] अपने आप प्रकट हुआ ॥ ६ ॥ उस अण्डे में उस भगवान् [ ऐश्वर्य्यवान् परमात्मा ] ने वर्ष भर रह कर अपने आप ही अपने ध्यान से उस अण्डे को दो टुकड़े कर दिया ॥ १२ ॥ उस [ परमात्मा ] ने उन दो टुकड़ों से सूर्य और पृथिवी, बीच में आकाश, आठ दिशाओं और जलों के निश्चय स्थायी स्थान को बनाया ॥ १३ ॥ निरु० १४ । १६ । परमात्मानम् । जलौघम् (वृत्वा) स्वीकृत्य (अभृज्यत) भ्रस्ज पाके लङ् । पक्वमभवत् । अदीप्यत (भृगुः) प्रथिम्रदिभ्रस्जो सम्प्रसारणं सलोपश्च (उ० १ । २७) भ्रस्ज पाके च-कुः, सम्प्रसारणं सलोपो न्यङ्क्वादित्वात् कुत्वं च । भृगवः, मध्यस्थानीदेवताः-निरु० ११ । १९ । भर्गयुक्तः । परिपक्वः । तेजस्वी । परमात्मरूपम् (वेद) विद ज्ञाने-लट् । वेत्ति । जानाति ॥