भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 600 में से

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आदित्यः वै देवः संस्फानः, आदित्यम् एव तत् आह ) एतन्नो गोपाय--४ और, देव संस्फान--५, यह दो मन्त्र वह बोलता है, सूर्य ही प्रकाशमान और यथावत् बढ़ता हुआ है, सूर्य को ही वह यह कहता है । ( एतन्नो गोपाय इति, अयन्ते योनिः इति अरण्योः अग्निम् समारोपयेत् ) एतन्नो गोपाय--६ और, अयं ते योनिः--७ इन दो मन्त्रों से दो अरणियों [ अग्नि मथने की लकड़ियों ] की अग्नि को समारोपित [ स्थापित ] करे । ( तत् आहुः, यत् अरण्योः अस्य समारूढः अग्निः नश्येत् उत्सीदेत्, पुनः आधेयः स्यात् इति ) यह कहते हैं—जो दो अरणियों की निकली हुई इस [ यजमान ] की अग्नि बुझ जावे [ अथवा वायु आदि से ] उड़कर बिखर जावे, फिर वह अग्न्याधान योग्य होवे । [ इसका उत्तर ] ( या ते अग्नेर्यज्ञिया तनूस्तया मे ह्यारोह तया मे हि आविश, अयं ते योनिः इति आत्मन् अग्नीन् समारोपयेत् ) या ते अग्नेर्यज्ञिया तनूः .....८ और, अयन्ते . योनिः--६, इन दो मन्त्रों से आत्मा में अग्नियों को समारोपित करे [ अर्थात् भौतिक यज्ञ न करे किन्तु मन्त्रों से आत्मिक यज्ञ करे ] । ( एषः ह वै अग्निः योनिः, तत् स्वस्याम् एव योन्याम् एनं सादयति ) यह ही अग्नि [ आत्मिक अग्नि, इस यजमान का ] घर है, तब वह [ अग्नि ] अपने ही घर में इस [ यजमान ] को स्थापित करता है ॥ ६ ॥ भावार्थः—यज्ञ, प्रज्वलित अग्नि में ही हवन करने से सफल होता है। यदि अग्नि बुझ जावे, तो मन्त्रों से आत्मिक यज्ञ करना चाहिये ॥ ६ ॥ विशेषः—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १—अयं नो नभसस्पतिः संस्फानो अभि रक्षतु । अस्मातिं गृहेषु नः—अथर्व० ६ । ७६ । २ ॥ ( अयम ) यह ( नभसः ) सूर्य [ वा आकाश ] का ( पतिः ) स्वामी परमेश्वर ( संस्फानः ) यथावत् बढ़ता हुआ ( नः ) हमारे लिये ( नः ) हमारे ( गृहेषु ) घरों में ( असमातिम् ) असामान्य [ विशेष ] लक्ष्मी वा वृद्धि को अभि ) सब ओर से ( रक्षतु ) रक्खे [ यह मन्त्र इस ब्राह्मण में कुछ भेद से है ] ॥ २—एतन्नो गोपाय--यह ब्राह्मण वचन है ॥ ३—त्वं नो नभसस्पत ऊर्जं गृहेषु धारय । आ पुष्टमेत्वा वसु—अथर्व० ६ । ७६ । १ ॥ ( नभसः पते ) हे सूर्य [ वा आकाश ] के स्वामी ! ( त्वम् ) तू ' नः ) हमारे ( गृहेषु ) घरों में ( ऊर्जम् ) बल बढ़ाने वाला अन्न ( धारय ) धारण कर । ( पुष्टम् ) पुष्टि ( आ ) और ( वसु ) धन ( आ एतु ) चला आवे [ यह मन्त्र इस ब्राह्मण में कुछ भेद से है ] ॥ ४—एतन्नो गोपाय—संख्या २ ऊपर देखो ॥ ( अङ्गिरसः ) विद्वांसः ( दीर्घसत्रम् ) दीर्घकालिकयज्ञम् ( उपयन्ति स्म ) प्राप्त- वन्तः ( उपद्रष्टारम् ) समीपेन अवलोकयितारम् ( उपश्रोतारम् ) उपश्रवण- शीलम् ( अनुख्यातारम् ) निरन्तरज्ञापकम् ( इष्टापूर्तेन ) इष्टेन च पूर्तेन च । अग्निहोत्रवेदाध्ययनदेवमन्दिरादिकर्मणा ( समम् ) सर्वथा ( नभसः ) णह बन्धने —असुन्, हस्य भः । नभ आदित्यो भवति—निरु० २ । १४ । सूर्यस्य । आका- शस्य ( पतिः ) पालयिता ( गोपाय ) रक्ष ( देव ) हे प्रकाशमान ( संस्फान )