भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 472

४३४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १२ है वह अग्नि [ तापक पदार्थ ] है, जो प्राण [ श्वास ] है वह वरुण [ स्वीकार करने योग्य पदार्थ ] है, जो मन है वह इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाला पदार्थ ] है, जो नेत्र है वह बृहस्पति [ बड़े बड़ों का पालने वाला पदार्थ ] है, जो कान है वह विष्णु [ व्यापक पदार्थ ] है। ( एते ह वै एतान् पञ्चभिः प्राणैः समीर्य उदस्थापयन् ) इन ही [ देवताओं ] ने इन [ असुरों ] को पांच प्राणों से मिलकर उठा दिया [ निकाल दिया ]। ( तस्मात् उ ह एव एताः पञ्च देवताः उक्थे शस्यन्ते ) इसलिये ही यह पांच देवता उक्थ [ स्तोत्र ] में स्तुति किये जाते हैं ॥ ११ ॥ भावार्थः-मनुष्यों को चाहिये कि मन, वाणी, प्राण, नेत्र और श्रोत्र आदि को स्वस्थ रख कर विघ्नों को हटावें ॥ ११ ॥ विशेषः-ऐतरेय ब्राह्मण ३ । ४६ में ( साकमश्वम् ) को साम अर्थात् स्तोत्र लिखा है और उसके सायण भाष्य में निम्नलिखित मन्त्रों की ओर साकमश्व साम के लिये संकेत किया है। १-एह्यू षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्येतरा गिरः । एभिर्वर्धास इन्दुभिः ॥ २-यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम् । तत्रा सदः कृणवसे ॥ ३-नहि ते पूर्तमक्षि- पद्मभुवन्नेमानां वसो । अथा दुवो वनवसे ॥ ऋग्० ६ । १६ । १६-१८, साम० उ० १ । १ । तृच २२, मन्त्र १, यजु० २६ । १३ ॥ १-( अग्ने ) हे अग्ने ! [ तेजस्वी विद्वान् ] ( उ ) अवश्य ( आ इहि ) तू आ, ( ते ) तेरे लिये ( इत्था ) सत्य सत्य ( इतराः ) दूसरी ( गिरः ) वाणियों को ( सु ) सुन्दर प्रकार से ( ब्रवाणि ) मैं कहूँ, ( एभिः ) इन ( इन्दुभिः ) ऐश्वर्य वाले पदार्थों से ( वर्धसि ) तू बढ़ ॥ २-[ हे विद्वन् ! ] ( यत्र क्व च ) जहां कहीं भी ( ते मनः ) तेरा मन हो, ( तत्र ) वहां तू ( सदः ) स्थान ( कृणवसे ) करता है, [ क्योंकि ] तू ( उत्तरं दक्षम् ) अति श्रेष्ठ बल ( दधसे ) रखता है ॥ ३-( नेमानां वसो ) हे नीतियों में वास करने वाले पुरुष ! ( ते ) तेरा ( पूर्तम् ) पूर्ति करने वाला कर्म ( अक्षिपत् ) [ हमारी ] आंखों से गिरने वाला ( नहि भुवत् ) नहीं होवे, ( अथ ) इसलिये ( दुवः ) [ हमारी ] सेवा को ( वनवसे ) तू स्वीकार कर ॥ कण्डिका १२ ॥ प्रजापतिर्ह्येतेभ्यः पञ्चभ्यः प्राणेभ्यो देवान् ससृजे । यदु चेदं किंच पाङ्क्तं तत् सृष्ट्वा व्यज्वलयत् । ते होचुर्देवाः, म्लानोऽयं पिता मयोभूः, पुनरिमं समी- र्योत्थापया१म इति । स ह सत्त्वमाख्यायाभ्युपतिष्ठते, यदि ह वा अपि निर्णिंक्तस्यैव कुलस्य सन्धुक्षणेण यजते, सत्त्वं हैवाख्यायाभ्युपतिष्ठते । यो वै प्रजापतिः स यज्ञः। स एतैरेव पञ्चभिः प्राणैः समीर्योत्थापितः । ये ह वा एनं पञ्चभिः प्राणैः समीर्योदस्थापयंस्तां उ एवैताः पञ्च देवता उक्थे शस्यन्ते ॥ १२ ॥ पालकः ( विष्णुः ) व्यापकः ( समीर्य ) संगत्य ( उदस्थापयन् ) उत्थापितवन्तः । निःसारितवन्तः ॥ १. पू. सं. "उत्थापयामीति" पाठः ॥ सम्पा० ॥