गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 488, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें४५० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४। क० १८ होत्राकाणाम् अप्रतिभूतम् इव हि शस्त्रम्) फिर यह ही त्रिष्टुप् छन्द वाले स्तोत्र प्रातःसवन में, मरुत्वतीय [ माध्यन्दिन सवन ] में और तीसरे सवन में सहायक होता लोगों का अप्रतिभूत [ प्रतिभू अर्थात् स्थानी बिना ] ही शस्त्र [ स्तोत्र ] हैं [ अर्थात् त्रिष्टुप् तीनों सवनों में अवश्य बोला जाता है ] । ( धीतरसं वै एतत् सवनम्, यत् तृतीयसवनम् ) पी चुके हुये रस वाला ही यह सवन है, जो तीसरा सवन है [ तीसरे सवन से पहिले सोमरस पी लिया जाता है फिर किस लिये तीसरा सवन है—इस प्रश्न का समाधान इस प्रकार है ] । ( अथ ह एतत् अधीतरसं शुक्रियं छन्दः, यत् त्रिष्टुभा यातयामसवनस्य एव तत् सरसतायै ) फिर यह बिना पी चुके हुये रस वाला, वीर्यवान् छन्द [ स्तोत्र ] है, जो त्रिष्टुप् [ तीनों सवनों में ठहरने वाले छन्द ] के साथ बीते हुये योग्य समय वाले सवन के रसीलेपन के लिये है [ देखो-ऐतरेय ब्रा० ६। १२ ] । ( सर्वं समवतीभिः परिदधति, यत् तत् समवतीभिः परिदधति. ) वे सब समवती ऋचाओं से [ सम शब्द वाली ऋचाओं से जैसे—समं ज्योतिः सूर्येण······अथर्व० ४। १८ । १, इत्यादि मन्त्रों से ] समाप्त करते हैं, क्योंकि वहां समवती ऋचाओं से वे समाप्त करते हैं। (अन्तः वै पर्यासः, अन्तः उदर्कः, अन्तः सजायाः उ ह वै अवेनाय अन्तेन एव अन्नं परिदधति = परिदधाति ) अन्त ही पर्यास [ विराम ] है, अन्त ही उदर्क [ अवसान वा विच्छेद अर्थात् रोक ] है, अन्त ही संगति के रक्षक के लिये अन्त के साथ ही अन्त को समाप्त करता है। [ एक एक विषय पर रुककर दूसरे को आरम्भ करके समाप्त किया जाता है ] । ( सर्वे मद्गतीभिः यजन्ति, यत् तत् मद्गतीभिः यजन्ति ) वे सब मद्वती [ मद शब्द वाली ] ऋचाओं से यज्ञ करते हैं [ याज्या ऋचा बोलते हैं ], क्योंकि वहां मद्वती ऋचा से वे यज्ञ करते हैं । ( सर्वे सुतवतीभिः पीतवतीभिः अभिरूपाभिः यजन्ति ) वे सब सुतवती [ सुत शब्द वाली ] ऋचाओं से, पीतवती [ पीत शब्द वाली ] ऋचाओं से और अभिरूप [ विषय के अनुकूल ] ऋचाओं से यज्ञ करते हैं। [ मद्गती, सुतवती और पीतवती ऋचाओं के लिये देखो ऋग्० १ । १६ । ८ । और बहुवचन शब्द होने से ब्राह्मण में समस्त इस नौ ऋचा वाले सूक्त का ग्रहण अभीष्ट है । अभिरूप शब्द से यह प्रयोजन है कि अभीष्ट देवता की स्तुति में उस देवता के सूचक पद आ जावें ] । ( यत् यज्ञं अभिरूपं, तत् समृद्धम् ) जो यज्ञ में विषय के अनुकूल कर्म है, वह समृद्ध है । ( सर्वे स्विष्टकृरवा अनुवषट् कुर्वन्ति ) सब स्विष्टकृत् मन्त्र [ यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं·········देखो--गो० उ० ३ । १ ] पढ़कर अनुवषट् [ समाप्ति सूचक पद ] पढ़ते हैं । ( अनुवषट्कारः स्विष्टकृतं नेत् अन्तरयाम इति ) अनुवषट्कार स्विष्टकृत् मन्त्र को कभी भी बीच [ व्यवधान ] से नहीं लेता [ स्विष्टकृत् के पीछे ही अनुवषट् होता है ] । ( असौ वै लोकः तृतीयसवनम् ) जगतोछन्दोयुक्तानि । जगते हितानि ( अप्रतिभूतम् ) प्रतिभूरहितम् । स्थानिना रहितम् ( धीतरसम् ) धेट् पाने--क्तः । पीतसारम् ( अधीतरसम् ) अपीतसा- रम् । सर्वरसोपेतम् ( शुक्रियम् ) शुक्र—घन् । वीर्ययुक्तम् । ( यातयामसवनस्य ) गतयोग्यकालसवनस्य ( सरसतायै ) सरसत्वाय ( सजायाः ) षञ्ज सङ्गे--कः, टाप् । सङ्गतेः ( अवेनाय ) श्यास्त्याह्वणविम्व्य इनच् ( उ० २ । ४६ ) अव रक्षणार्दौ